04 June, 2017

Mother's Day पर अनिशा सिंह जी दो कविताएं | भाग -2


प्यार बहुत माँ आज भी तुमसे
बस अब उतना वक्त नही है
व्यस्त हुई इतनी दिनचर्या
घंटों बतियाने का समय नही है
तुम गांव छोड़ नही आ सकती
मै रोजगार कैसे छोड़ूं?

दाना-पानी परदेश मे है
कैसे इसे छोड़कर घर लौटू?
बिन रोजगार कोई मोल नही
घर मे भी होता ठौर नही
जीवनलीला का अहम सफर है
अस्त -व्यस्त जीवन का पहर है

सब कुछ है पर चैन किधर है
तेरे बिन बंजर सा ह्रदय है
कहते हैं दुनिया वाले
माँ की ममता को भूल गया
माँ को छोड़कर गांव मे
बेटा अपनी दुनिया मे रमा

माँ! दुनिया की बातों पर
क्या तू भी मोहर लगाती है?
अनकहा सा एक एहसास है तू
अन्तर्मन की आवाज है तू
मै कहीं रहूं, मै कुछ भी करूं
हर पल आहट सी, साथ है तू

क्षणभर भी ओझल न होती
तन-मन का अदृश्य विश्वास है तू
मै मानव हूँ, मै जीवित हूँ
अस्तित्व का मेरे प्रमाण है तू।

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अनिशा सिंह जी जगत तारन गर्ल्स इंटर कालेज, इलाहाबाद में अंग्रेजी की प्रवक्ता हैं और कविताएं लिखना उनका शौक है। अनिशा जी ने हाल ही में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। उनका कहना है कि जो भी मै महसूस करती हूं, उसे शब्दों में पिरोकर कविता का रूप दे देती हूँ। आपसे ई-मेल poetessanisha@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।

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