08 June, 2017

संवेदना | ब्लॉग एकलव्य


प्रस्तुत रचना "संवेदना" इस संसार में प्राणीमात्र के स्वार्थपरक आचरण का वर्णन है। जब एक मानुष दूसरे दुःखी मानुष के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करता है ,समाज 'संवेदना' प्रकट करने वाले मानुष के प्रति उसी प्रकार अपना आचरण व्यक्त करता है जिस प्रकार प्रेमपाश में पड़ी कुँवारी नायिका अपने ही जन के कोप का भागी होती है।  धन्यवाद,  ''एकलव्य''  

मन ये मेरा बने है मानव
तन की छाया लगे है! दानव
क़ैद हूँ मैं, तेरे आँगन में
खड़ा प्रहरी तूँ बनके जीवन में 

लाख विचार करूँ! जो जन में
पात्र बनूँ बस, हँसी का जग में
एक अनुभव सी जागूँ! पल में
बनूँ मैं कांधा, दुःखी जगत में 

अंधकार में खो जाती हूँ
जुगनू सा मैं सो जाती हूँ
चलती जो विपरीत हवायें
खग बनकर! मैं उड़ जाती हूँ 

नहीं ज्ञात है कोई ठिकाना
बस समाज का ताना-बाना!
जिसमें फँसी-सी मैं रहती हूँ
निकल क़ैद से बस कहतीं हूँ!

बचपन में थोड़ी, नटखट हूँ
हुई! सहज जो यौवन आई
घरवाले बांधे हैं मुझको
मेरी नहीं तूं, धन है पराई 

ज्यों मैं घर की, चौखट लांगू
अपनों से बिसराती जाऊँ
कहे समाज कलंक! हूँ घर की
स्वयं के आँसूं पोंछे जाऊँ

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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