16 June, 2017

न्याय की वेदी | ब्लॉग एकलव्य


मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है!
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही
करता, मानुष! स्वयं हूँ, कहकर!
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन! निर्लज्ज़ 
तूँ, मरघट 

स्वर चीखतीं! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा द्रवित 
हृदय होता है! शोक की 
ऊष्मा, पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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