08 June, 2017

कर्तव्य परायणता | ब्लॉग नई सोच


उषा की लालिमा पूरब में
नजर आई...
जब  दिवाकर रथ पर सवार,
गगन पथ पर बढने लगे...
निशा की विदाई का समय
निकट था...
चाँद भी तारों की बारात संग
जाने लगे...

एक दीपक अंधकार से लडता,
एकाकी खडा धरा पर...
टिमटिमाती लौ लिए फैला रहा 
प्रकाश तब...
अनवरत करता रहा कोशिश वह
अन्धकार मिटाने की...
भास्कर की अनुपस्थिति में उनके दिये
उत्तदायित्व निभाने की...

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