02 May, 2017

बचपन मे जातीय भेदभाव की शिकार हुई शिक्षिका | अनिशा सिंह


बचपन मे जातीय भेदभाव की शिकार हुई शिक्षिका
जब करती है वही बर्ताव अपनी छात्राओं के साथ 
कुंठित हो जाता है मन
समाज की इन जातीय व्यवस्थाओं से
जारी रहती है प्रताड़ना शिक्षण के दौरान 
खोज लेतीं हैं तरकीबें 

शिकार को प्रताड़ित करने की 
नादान बालिकायें समझ ही नही पाती 
मैडम के गुस्से का कारण 
करतीं हैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 
फिर भी मैडम के माथे से मिटती नही शिकन
बचपन मे शिक्षिका द्वारा किया गया बर्ताव 
टीसता रहता है उन्हें, इतने वर्षों बाद भी 
जो उन्होंने सहा, वही वे करती हैं

बन चुकी हैं अपनी उसी शिक्षिका की प्रतिलिपि 
जिससे करती रही हैं आज तक घृणा 
दोहराया जा रहा है वही विद्यालयी इतिहास 
शिकार भी वही है, शिकारी भी वही 
बदली है तो बस उनकी जाति
पहले शिकार था दलित, शिकारी था सवर्ण 
आज दलित है शिकारी, शिकार है सवर्ण 
घृणा की परिणति प्रतिशोध होती है 

झलकती है हर वर्ष, परीक्षा परिणाम मे
निकाल ही लेती हैं कोई न कोई कमी 
चुन-चुन कर शिकार को देती हैं कम अंक 
जैसे उन्होंने पाये थे अपने शिकारी से
आखिर कब तक जलती रहेगी ये ज्वाला?
क्यों नही बुझती उनके अन्दर सुलगती आग?
क्यों नही करतीं आग को बुझाने का प्रयास?
क्यों नौ, सत्रह, उन्नीस का पहाड़ा 

पूंछती हैं सिर्फ शिकार से?
कबतक चलेगा 
ये छुपा हुआ जातीय भेदभाव?
क्यों उनको सहना पड़ा था 
पवित्र पेशे मे अपवित्र व्यवहार?
सकारात्मक या नकारात्मक 
प्रत्येक शिक्षिका होती है प्रभावित 
अपनी शिक्षिका से 

ना जाने कबतक ढोयेंगी ये
अपनी शिक्षिका से मिला 
नकारात्मक संस्कार 
क्यों नही समझतीं जाने-अनजाने 
कर रही हैं फिर से
जातीय प्रतिशोध से भरी
शिक्षिका तैयार।

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अनिशा सिंह जी अंग्रेजी की प्रवक्ता हैं और कविताएं लिखना उनका शौक है। अनिशा जी ने हाल ही में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। उनका कहन है कि जो भी मै महसूस करती हूं, उसे शब्दों में पिरोकर कविता का रूप दे देती हूँ। आपसे ई-मेल poetessanisha@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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