14 May, 2017

अंतराल के बाद | ब्लॉग ऊंचाईयां


जहाँ दादी और पौतों में प्यार की बात है, यहाँ यही बात सच है कि असल से सूद अधिक प्यारा होता है।
परन्तु इतने सालों का फांसला हो तो......सोच का परिवर्तन अवश्य होता है। यूँ तो दादी अपने पौते से बहुत प्यार करती थी, परन्तु अपने पौते के मनमौजी स्वभाव से अक्सर नाराज़ रहती थी। क्योंकि दादी चाहती थी, कि जैसा मैं कहती हूँ, मेरा पौता वैसा ही करे, वो अपने ढंग से अपने पौते को चलाना चाहती थी।
* परन्तु परिवर्तन प्रकृति का नियम है *
दादी ने घर पर ग्रह शान्ति के लिये पूजा रखवाई थी, उनके पौते ने पूजा की सारी तैयारी करके दी, पर दादी की इच्छा थी कि उनका पौता पूजा की शुरुआत से लेकर पूजा खत्म होने तक पूजा में ही बैठे और धोती कुर्ता भी पहने। ....पर दादी भी थोड़ी ज्यादा ही जी जिद्द कर रही थी, उनके पौते ने कभी धोती नही पहनी थी और न ही वो पहनना चाहता था। उसकी और दादी की ऐसी छोटी -मोटी बहस होती रहती थी।
पौता अपनी दादी से कह रहा था दादी कपडों से क्या होता है और पूजा -पाठ मन की सुन्दर अवस्था है, क्या फर्क पड़ता है, भगवान हमारे कपड़ों को थोड़े देख रहा है। हम भगवान को कभी भी किसी भी समय कैसे भी याद कर सकते है, दादी अपने पौते की बातें सुनकर थोड़ा परेशान हो कह रही थी, ना जाने तुम कब समझोगे की भगवान की पूजा का क्या विधि विधान है, जरा भी त्रुटि हो जाये ना, तो हमारे भगवान नाराज हो जाते हैं, पोता बोला .... दादी आपके भगवान बड़े जल्दी नाराज होते है, क्यो?
वैसे तो हम गाते हैं, तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो,अब आप बताओ माता पिता अपने बच्चों से इतनी जल्दी नाराज हो जाते है क्या? उन्हें तो सिर्फ हमारी सच्ची भवनाएं और श्रद्धा ही चाहिए ..... इतने में पूजा जिन्होंने घर पर पूजा करनी थी वो पंडित जी आ गये, पंडित समझदार थे।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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