16 April, 2017

मत कर ! गर्व तूं इतना | ब्लॉग एकलव्य


मत कर ! गर्व तूं इतना
संविधान भाव बनाया मैंने
स्नेह से इसे सजाया मैंने
संवेदनायें पल-पल पल्लवित होंगी
स्वप्न तुझे दिखलाया मैंने।

मत कर ! गर्व तूं इतना

उड़ा विद्वेष था आसमान में
प्रेम धरा पर लाया मैंने
स्वर्ण अक्षरों में अंकित होता
मानव धर्म सिखाया मैंने।

मत कर ! गर्व तूं इतना

लोहा लिया था मैंने जग से
जग का कोप उठाया मैंने
वे करते थे निंदा मेरी
स्नेह से गले लगाया मैंने।

मत कर! गर्व तूं इतना

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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