18 March, 2017

हाँ, मैं मन हूँ | एकलव्य


हाँ मैं मन हूँ 
मानव का करतल हूँ 
आत्मा से द्वेष रखता  
चिरस्थाई महल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ....... 

प्राणी को उद्वेलित करता  
बनके सवेंदनायें,प्रबल हूँ 
बन अशक्त जो बैठा प्राणी 
प्रस्फुटित करता तरंग हूँ
हाँ,मैं मन हूँ....... 

मृत हुई जो तेरी इच्छा 
प्राण फूँकता,नवल हूँ 
भरता हूँ,चेतना की लहरें 
प्रेरणा एक,सबल हूँ
हाँ,मैं मन हूँ.......

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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