03 February, 2017

Dr. Roopchandra Shastri 'Mayank' - Blogger of the Month for January 2017


इस माह हम आपको जिस शख्स से मिलवाने जा रहे है, उन्हे आप भी भलीभॉति जानते होगें और जो नही जानते वो अब जान जायेंगे। वो शख्सियत है डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' यानि वर्ष 2017 के पहले ब्लॉगर ऑफ द मंथ। शास्त्री जी को अक्सर सभी लोग उनके चर्चा मंच से जानते होंगे लेकिन उन्होने चर्चा मंच को छोड़कर कई ब्लॉग बनाए और उन्हे सही तरह से संचालित भी किया। उनके ब्लॉग प्रेम को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन्होने ब्लॉगिग को शौक नही बल्कि जुनून बनाया है या कहे कि जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी का परिचय

उत्तराखण्ड ऊधमसिंह नगर के निवासी शास्त्री जी का जन्म 4 फरवरी 1951 को  हुआ है। उन्होने ने हिन्दी-संस्कृत से एम.ए. तक शिक्षा ग्रहण की है। उन्होने सन् 1996 से 2004 तक लगातार उच्चारण पत्रिका का सम्पादन किया है और सन् 2005 से 2008 तक अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग, उत्तराखंड सरकार में सदस्य भी रहे है। इसके अलावा 2011 में 'सुख का सूरज', 'धरा के रंग', 'हँसता गाता बचपन' और 'नन्हें सुमन' लम्बे अन्तराल के बाद 2016 में एक साथ उनकी दोहों पर आधारित दो पुस्तकें "खिली रूप की धूप" और "कदम-कदम पर घास" को मिलाकर अब तक 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें हिन्दी साहित्य निकेतन और परिकल्पना के द्वारा 2010 के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार और श्रेष्ठ गीतकार के रूप में हिन्दी दिवस नई दिल्ली में उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमन्त्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा दो बार सम्मानित किया जा चुका है।

आईये जानते है शास्त्री जी का ब्लॉगिंग के सफर

दिन बुधवार, दिनांक 21 जनवरी सन् 2009 जब रूपचन्द्र शास्त्री जी ने उच्चारण नाम के ब्लॉग को सृजित कर इस पर पहली पोस्ट लिखी थी। जी! हां, यही वह समय था जब शास्त्री जी आए थे हिन्दी ब्लॉग दुनिया में बिना किसी अस्त्र शस्त्र के। यहाँ पर शास्त्री जी ने शुभकामनाओं के साथ अपने पाठकों का स्वागत किया। आईये पढ़ते है कैसे-

सुख का सूरज उगे गगन में, दु:ख का बादल छँट जाए।
हर्ष हिलोरें ले जीवन में, मन की कुंठा मिट जाए।
चरैवेति के मूल मंत्र को अपनाओ निज जीवन में -
झंझावातों के काँटे पगडंडी पर से हट जाएँ।

यह उनकी पहली ब्लॉग पोस्ट थी, जिन पर उन्हे उस समय एक बेनामी और दो नामी लोगो ने स्वागत करते हुए बधाई दी थी। इस तरह उनके ब्लॉग दुनिया में पहला दिन बेहतरीन और शानदार रहा। जनवरी के पूरे माह में उन्होने नौ रचनाएं लिख डाली। बस फिर क्या था इसके बाद तो उन्होने कभी पीछे मुड़कर भी नही देखा और प्रत्येक माह कम से कम 30 रचनाएं जरूर लिखते थे और प्रत्येक वर्ष लगभग 350 रचनाओं का रिकार्ड लगातार बना हुआ है। उन्होने अब तीन हजार एक सौ चौरासी रचनाओं का सृजित किया है।

दूसरा ब्लॉग : रूप मयंक - अमर भारती

उन्होंने 19 फ़रवरी 2009 को एक ब्लॉग बनाया जिसका नाम 'रूप मयंक - अमर भारती' था। अध्ययन करने पर पता चला कि इस ब्लॉग का मकसद साप्ताहिक पहेलियां पोस्ट करना था। ताकि पाठकों के साथ बेहतर संवाद हो सके। इस ब्लॉग पर शास्त्री जी ने 235 पोस्ट लिखी है। इस ब्लॉग ने 11 अगस्त 2013 को अन्तिम शब्द कहे थे।

तीसरा ब्लॉग : शब्दो का दंगल

इसके बाद उन्होने 30 अप्रैल 2009 को 'शब्दों का दंगल' का निर्माण किया और तैयार हो गये दंगल मचाने को। इस मंच पर उन्होने पहले वर्ष शगुन के तौर पर 101 बार दंगल मचाया और फिर उन्होने दूसरे वर्ष 57 बार। बाकी के वर्षो का अध्ययन करने से लगता है कि उन्हे दंगल मचाने का शौक कम हो गया था।
शास्त्री जी आप बुरा मत मानियेगा, हम तो सिर्फ खिंचाईं कर रहे हैं। 2016 में तो एक बार ही दंगल हुआ क्योंकि आमिर खान जी दूसरी दंगल ले आए है इसलिए शायद शास्त्री जी ने अपने 'दंगल' को आजाद कर दिया है। उन्होंने अबतक 'दंगल' के लिए 222 ब्लॉग पोस्ट लिखीं हैं।

चौथा ब्लॉग : धरा के रंग

इसी कड़ी में उन्होने 04 नवंबर 2009 को 'धरा के रंग' नाम से एक नया ब्लॉग बनाया। जिसका मकसद हिन्दी ब्लॉगरों को एक दूसरे से परिचित करना और ब्लॉगों को एक मंच पर लाकर पाठकों के लिए सुगम बनाना था। लेकिन यहां पर भी शास्त्री जी अधिक ध्यान नहीं दे पाये लेकिन ब्लॉगरों व पाठकों का काफी सहयोग मिल रहा था। इस ब्लॉग के लिए उन्होंने आजतक लगभग 165 पोस्ट लिखी है।

पांचवा ब्लॉग : चर्चा मंच

वहीं, दिसंबर 2009 में उन्होने सबसे ज्यादा चर्चित ब्लॉग 'चर्चा मंच' की स्थापना की। जिस पर उन्होने पहली पोस्ट 18 दिसम्बर को लिखी, जिसका शीर्षक "दिल है कि मानता नही" था। इस मंच पर उनका सहयोग दिनेश गुप्ता (भारतीय खनि विद्यापीठ, धनबाद में वरिष्ठ तकनीकी सहायक) और दिलबाग विर्क (अध्यापक) भी कर रहे है। इस ब्लॉग पर अब तक 2585 पोस्ट लिखी जा चुकी है।

छठा ब्लॉग : कार्टूनिस्ट मयंक

वहीं हमारे खोजी नजरों ने उनके काटूर्निस्ट अवतार का अवलोकन भी किया, जो 23 नवंबर 2012 को पहली बार सबके सामने आया और उन्होने कार्टूनिस्ट भाई आर.डी.एक्स. का आभार जताते हुए यह कार्टून पोस्ट किया था। इसके बाद उन्होने इस ब्लॉग पर पहले वर्ष 19 पोस्ट लिखी और धीरे-धीरे शायद मोह भंग होता गया। यह तो हम कह रहे है लेकिन जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होने बताया कि सभी जगह इतना ध्यान दे पाना संभव नही हो पाता है। इस ब्लॉग के लिए उन्होने लगभग 40 ब्लॉग पोस्ट किये।
उन्होने पहली पोस्ट के लिए जो कार्टून बनाए थे उन्हे आप भी देखें।


सातवां ब्लॉग : नन्हे सुमन

वर्ष 2010 में उन्होने छोटे और नन्हे बच्चों को ध्यान में रखते हुए 'नन्हे सुमन' ब्लॉग का निर्माण किया और 09 फरवरी 2010 को पहली पोस्ट 'तार वीणा के बजे बिन साज सुन्दर' लिखी। इस ब्लॉग पर शास्त्री जी अबतक 273 ब्लॉग पोस्ट लिख चुके है।

मयंक जी के अन्य ब्लॉगस और उपलब्धियां

इसके अलावा रूपचन्द्र शास्त्री जी ने सुख का सूरज (102 पोस्ट), हँसता गाता बचपन (99 पोस्ट) और मयंक की डायरी (202 पोस्ट) भी सृजित किए और उनके लिए लेखन किया।
सभी ब्लॉगों की पोस्ट को लिया जाये तो मयंक जी अब तक सात हजार एक सौ सात पोस्ट या रचनाएँ लिखी है। जो वास्तव में ही स्वयं में एक रिकार्ड है। रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी आपकी कार्य के प्रति लगन देखकर हमें भी महसूस हुआ है कि वास्तव में आपने हिन्दी साहित्य को बहुत कुछ दिया है, साथ ही हिन्दी ब्लॉग दुनिया को भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। जिसके लिए यह सम्मान कुछ नही है।

हिन्दी ब्लॉगरों के लिए मंयक जी कुछ कहना चाहते है

आज कम्प्यूटर और इण्टरनेट का जमाना है। जो हमारी बात को पूरी दुनिया तक पहुँचाता है। हम कहने को तो अपने को भारतीय कहते हैं लेकिन विश्व में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए हम कितनी निष्ठा से काम कर रहे हैं यह विचारणीय है। हमारा कर्तव्य है कि हम यदि अंग्रेजी और अंग्रेजियत को पछाड़ना चाहते हैं तो हमें अन्तर्जाल के माध्यम से अपनी हिन्दी को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाना होगा और यह तभी सम्भव है जबकि हम अपना स्वयं का ब्लॉग बनायें। ब्लॉगिंग का एक बड़ा फायदा यह भी है कि जो लोग किन्हीं कारणों से अपने सृजन को प्रकाशित नहीं करा सके हैं वो लोग अपने साहित्य को स्वयं प्रकाशित कर सकते हैं। इससे उनके सृजन की गूँज भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में सुनी व पढ़ी जायेगी।
अतः हम अधिक से अधिक ब्लॉग हिन्दी में बनायें और हिन्दी में ही उन पर अपनी पोस्ट लगायें। इससे हमारी आवाज तो दुनिया तक जायेगी ही साथ ही हमारी भाषा भी दुनियाभर में गूँजेगी। आवश्यक यह नहीं है कि हमारे राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देशों में जाकर हिन्दी में बोल रहे हैं या नहीं बल्कि आवश्यक यह है कि हम पढ़े-लिखे लोग कितनी निष्ठा के साथ अपनी भाषा को सारे संसार में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं।
अन्त में एक निवेदन उन ब्लॉगर भाइयों से भी करना चाहता हूँ जो कि उनका ब्लॉग होते हुए भी वे हिन्दी ब्लॉगिंग के प्रति बिल्कुल उदासीन हो गये हैं। जागो मित्रों जागो! और अभी जागो! तथा अपने ब्लॉग पर सबसे पहले लिखो। फिर उसे फेसबुक/ट्वीटर पर साझा करो। आपकी अपनी भाषा देवनागरी आपकी बाट जोह रही है।

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