01 October, 2016

जानें! नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

पाठकों और सभी सम्मानित ब्लॉगरों को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।


हमारे देश में साल भर अलग-अलग प्रकार के उत्सव मनाने की हमेशा से एक परम्परा रही है जैसे कि दिवाली-दशहरा-होली-शिवरात्री और नवरात्रि आदि इनमे से कुछ उत्सव को हम रात्रि में ही मनाते है। इनका अगर कोई विशेष कारण न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता है नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार क्या है दरअसल नवरात्र शब्द से “नव अहोरात्रों (विशेषरात्रियों) का बोध” होता है और इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि “रात्रि”शब्द सिद्धि का प्रतीकमाना जाता है।
नवरात्रि के दिन नवदिन नहीं कहे जाते हैं लेकिन नवरात्रि के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम थोडा नवरात्रि को समझे-हमारे मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है मतलब कि विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्रि मनाया जाता है, लेकिन फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है और इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम,यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं।
जो व्यक्ति मंत्रो का सिद्ध करना चाहता है वो साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।
अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं यहाँ तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है।

क्या है नवरात्र का वैज्ञानिक रहस्य

आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया और अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं और हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।
एक वैज्ञानिक रहस्य ये भी है कि अगर दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाती है किंतु यदि रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है जहाँ आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है।
इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है यही रात्रि साधना का वैज्ञानिक रहस्य है जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

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यह लेख ‘उपचार और प्रयोग’ ब्लॉग से लिया गया है, जिसके संचालक व लेखक सतनान श्रीवास्तव जी है। श्रीवास्तव जी कानपुर से है ओर आध्यात्मिक और आयुवेर्दिक ग्रन्थों की जानकारियों को पाठकों के बीच लाने की कोशिश कर रहें है। आपसे ई-मेल satyan720620@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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