04 August, 2016

स्त्री, अर्थ, अनर्थ?


कौन कहता है कि मर्दों के लिए औरतें शरीर मात्र हैं। अब इतनी भी संकुचित नहीं है उनकी मानसिकता। नज़र घुमाने की देर है, ऐसे परम प्रतापियों से भरी पड़ी है दुनिया जिनकी औरतों में दिलचस्पी चातुर्दिक होती है। जो उनके धर्म, काम और मोक्ष के साथ-साथ उनके ‘अर्थ’ के भी तारणहार बनना चाहते हैं। जो हमारे अर्थोपार्जन पर हर किस्म की टिप्पणी करने का दम खम भी उतनी ही शिद्दत से रखते हैं। बहुतों की नींदें हराम रहीं हैं ये सोच सोचकर कि औरतों को नौकरी क्यों चाहिए, पैसों की ज़रूरत ही क्यों है, कमाती हैं तो उनका करती क्या हैं वगैरा-वगैरा।
हम जब नौकरी की तलाश में आकाश पाताल एक कर रहे थे तो साथ पढ़ने वाले कुछ लड़के ऐसे देखते जैसे जॉब मार्केट में उतरने की हिमाकत कर लड़कियों ने उनके हिस्से की रोटी छीनकर खा ली हो। एक ने तो दार्शनिक अंदाज़ में कह भी दिया “हमारे लिए भी तो छोड़ दो कुछ नौकरियां, तुम्हें कौन सा घर चलाना है, कमाने वाला पति तो ढूंढ ही देंगे मां-बाप”
नौकरी मिलने के बाद हर मोड़ पर महानुभाव टकराए जिन्हें पर्सनल बैलेंस शीट की ऑडिट करने का अधिकार चाहिए था। खींसे निपोरते,  सवालों को गोले दागते चलते लोग बाग “मल्लब आप करती क्या हैं पैसों का, मने कि अब आपसे तो लेते नहीं होंगे घर वाले, आगे के लिए भी जमा नहीं करना आपको, वो सब तो मने कि पति का काम होता है ना”
सुन-सुनकर खून जलता लेकिन अपनी असहमतियों को दबाकर रखना लड़कियों के स्कूल के सिलेबस में ही शामिल होता है। वैसे भी हमारे ज़माने तक ‘फीलिंग मैड’ और ‘फीलिंग एंग्री’ वाले स्माइली का भी जन्म नहीं हुआ था।
ऑफिस में भी अपनी जान को चैन नहीं। “इन्वेस्टमेंट के बारे में कोई सलाह चाहिए तो सीधे मुझे बताना, क्या है कि लड़कियों को आइडिया नहीं होता ना फाइनेंस का, कहो तो कभी बैठते हैं ना साथ में” ऐसे वालों की सूची अलग लंबी है।
वैसे ये चर्चा पुरूषोचित ठसक से भरी उन महिला परिचितों/रिश्तेदारों के बिना भी अधूरी है जो एक्सरे मशीन के कैलीबर वाली आखों से हमारे डेढ़ कमरे के किराए के घर का मुआयना करती ब्रह्म वाक्य दागा करतीं, “ ये ल्लो, टीवी, फ्रिज, पलंग, कुर्सी सब तो जोड़ ही लिया है तुमने,  तुम्हें तो बस दो सूटकेसों में एक पति घर लाने की ज़रूरत है...हेंहेंहेंहें"

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डॉ. शिल्पी झा अगस्त 2015 से ब्लॉगिंग कर रही है। आपके ब्लॉग पर अधिकतर लेख समाजिक मुद्दो से जुड़े हुए है।


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