25 August, 2016

'हर एसिड अटैक में प्रेम का एंगल नहीं होता'

बेटियों को समाज में बोझ समझा जाता है, उन्हे हर बात के लिए टोका जाता है। उन्हे परिवार का मान रखने और घरेलू कार्य करने के लिए ज्यादा उकसाया जाता है और उन्हे सलाह दी जाती है कि घर के कामों में ही ज्यादा रूचि रखनी चाहिए वरना ससुराल वाले क्या कहेंगे। आज भी समाज में मौजूद कई परिवारों में बेटों के मुकाबले बेटियों की उपेक्षा की जाती है और बेटो को ज्यादा लाड़-प्यार दिया जाता है। जबकि अधिकतर केसो में बेटे हमेशा अपने माता-पिता के पास सुख व दुख के समय नही होते है। लेकिन अधिकतर केसो में बेटी, हमेशा अपने माता-पिता के साथ होती है और उनके दुखो को समझती है।
कितने अफसोस की बात है कि आज के युग में भी बेटी को बोझ समझा जाता है। आज भी बहुत से घरो में बेटियों की परवरिश में भेदभाव रखा जाता है। ऐसा ही एक मामला हमने अपने नये पड़ोस में देखा, जब हम नये-नये यहां पर शिफ्ट हुए थे, हमने देखा कि पड़ोस में तीन बच्चे खेल रहे थे जिनमें दो लड़कियां थी और एक लड़का। लड़का दिखने में किसी अच्छे घर का लग रहा था और लड़कियां किसी गरीब घर से लग रही थी। हमने सोचा पड़ोस का लड़का होगा खेलने आया होगा। लेकिन अगले दिन पता चला कि वह तीनों भाई-बहन थे, हम चकरा गये कि बच्चों में इतना फर्क किया जा रहा है। एक सप्ताह में हमें अपने पड़ोसी की मनोदशा का पता चला कि ये सिर्फ लड़के के इच्छुक थे जबकि लड़की पैदा हो गई, जिसे सुनकर हमें बहुत बुरा लगा और अफसोस भी हुआ कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है।
भई! हमारे हमारे पास भी एक बेटी है जिसे हम दोनो पति-पत्नी ने भगवान से मन्नते कर मांगा है और जो हम दोनो की बहुत लाडली है, लेकिन बेटी के साथ के लिए भी भविष्य में हमारी इच्छा यही है कि एक बेटी और हो। हम चाहते है कि समाज में बेटी को लेकर बदलाव आये और उन्हे समझना होगा कि बेटियां बेटे से बढ़कर है। बेटियां एक नही दो घरो को रोशन करती है।
इसी के साथ हम आपको एक ऐसी बेटी की कहानी बता रहे है, जिसके पिता ने बेटी होने पर उसे और उसकी मां पर तेजाब डाल दिया था।


अनमोल रॉड्रीग्जहर : एक बेटी जिसे पिता ने ही दिया दर्द




अनमोल रॉड्रीग्जहर कहती हैं कि लोगों को लगता है कि एसिड से अगर कोई लड़की जली है तो जरूर किसी सिरफिरे आशिक का काम होगा, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ।
मुंबई की रहने वाली अनमोल रॉड्रीग्ज (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके साथ उनके पिता ने ऐसा किया, जब वो सिर्फ कुछ महीनों की थीं।
उनके पिता ने लड़की होने के गुस्से में उनकी माँ पर तब तेजाब फेंका था जब वो अनमोल को दूध पिला रही थीं।
अनमोल बताती हैं, ‘मेरे पिता इस बात से खुश नहीं थे कि मेरी मां ने एक बेटी को जन्म दिया है और इसलिए उन्होनें एक दोपहर मेरी माँ पर तेजाब फेंका। मेरी माँ ने मुझे ढंक लिया लेकिन वो खुद नहीं बच सकीं।’
एक तरफ जहां आज पीवी सिंधू और साक्षी मलिक के मेडल जीतने के बाद देश की बेटियों को दुआएं दी जा रही हैं, वहीं अनमोल के लिए जिंदा रहना भी मुश्किल था।
वो कहती हैं, ‘मेरे पिता को जेल हो गई और मेरे ननिहाल के लोगों ने कुछ दिन मेरा ईलाज करवाने के बाद मुझे बोझ समझ कर छोड़ दिया। मुंबई के एक अनाथाश्रम में फिर मुझे जगह मिली लेकिन ये तो सिर्फ शुरूआत थी।’
अनमोल 22 साल की हैं और उन्होंने अपना नाम सोशल मीडिया पर बदल लिया है और वो किसी एक धर्म को नहीं मानती हैं।
वो बताती हैं कि मेरे साथ हुई घटना के बाद जैसे भगवान से मेरा भरोसा ही उठ गया था। मैं किसी एक धर्म में भरोसा नहीं रख पा रही थी, लेकिन फिर मुझे लोगों ने हौसला दिया, जिंदा रहने की आस दी, वो अलग अलग धर्म के लोग थे और ऐसे में मैंने भी सभी धर्मों को मानने का निर्णय लिया। मेरे दोस्त मुझे अनमोल बुलाते थे और इसलिए मैंने अनमोल नाम को ही रख लिया।
अनमोल इन दिनों अपनी नौकरी को लेकर खासी परेशान हैं और वो इस बात को देखकर हैरान है कि लोग कैसे एसिड अटैक विक्टिम के साथ भेदभाव करते हैं।
उनका कहना है कि एक साल पहले एल एंड टी कंपनी में अंकाउंट्स विभाग की नौकरी से मुझे कम अनुभव के आधार पर निकाल दिया गया और इसके बाद से मैं जहां भी नौकरी मांगने जाती हूं वहां अजीब बर्ताव किया जाता है। कोई बोलता नहीं लेकिन चेहरे के भाव से समझ आ जाता है कि वो मुझे देखकर घृणा महसूस करते हैं।
अनमोल मुंबई के जिस अनाथालय में रहती थी वहां 18 साल की उम्र के बाद बच्चों को रखने की व्यवस्था नहीं है।
ऐसे में अनमोल को काम तलाशना एक मजबूरी थी। वो कहती हैं, ‘एक आम आदमी हमारा दर्द नहीं समझ सकता, 22 साल पहले मैं जली थी, लेकिन आज भी मेरे चेहरे और आँखो से पानी आ जाता है।’
‘धूप में जला हुआ हिस्सा बुरी तरह से जलता है, पसीना कई बार खराब आँख में चला जाता है तो मिर्च लगने जैसी जलन होती है। इस सबके लिए जो दवाएं और सर्जरी जरूरी है वो महंगी हैं और इसके लिए मेरे लिए पैसे कमाना जरूरी है।
एसिड अटैक विक्टिम्स के लिए तो कई तरह के कैंपेन चलाए जाते हैं, ऐसे में क्या वहां से अनमोल को कोई मदद नहीं मिली?
आगरा के मशहूर ‘शीरोज’ कैफे को सिर्फ एसिड अटैक विक्टिम चलाती हैं। वहां काम कर चुकी अनमोल बताती हैं, इन ‘सोशल’ चीजो का तरीका बहुत अलग होता है। वहां मीडिया ज्यादा आता है और ग्राहक कम, वहां आपको एक ठिकाना मिल सकता है लेकिन जिंदगी चलाने के लिए आसरा नहीं।
अनमोल के साथ 1994 में एसिड अटैक की घटना हुई थी। वो कहती हैं कि आजकल सरकार की ओर से एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद की जाती है लेकिन उनके साथ यह तब हुआ जब इन मामलों पर कोई आवाज नहीं उठती थी।
अनमोल बिना किसी का नाम लिए कहती हैं, ‘कुछ पीड़ितों को मीडिया सिलेब्रिटी बना दिया गया है लेकिन बाकी लड़कियों का क्या? हमें तो लोग देखना भी पसंद नहीं करते। आज मैं फिल्म भी अकेले देखने जाती हूं और भले ही एक दिन आप मेरे साथ ले जाएंगे, पर क्या आप मेरे साथ मेरा दर्द बाँट सकते हैं?

No comments:
Write टिप्पणियाँ


Blog this Week