06 August, 2016

बेचारा (कहानी) - झरोखा ब्लॉग से


वो अनाथ हो गया था जब उसकी उम्र आठ साल की थी। सर पर से मां-बाप दोनों का साया उठ गया।बिखर गया था उसका बचपन और वो रह गया था अकेला इस पूरी दुनिया की भीड़ में।
वो था बहुत ही गरीब परिवार का। किसी ने भी आगे बढ़ कर उसका हाथ नहीं थामा। किसी ने उसके आंसू नहीं पोंछे। पर जब लोग उस मासूम को देखते तो सबके मुंह से बस एक आह सी निकलती।“ अब क्या करेगा ये बेचारा? क्या किस्मत लेकर पैदा हुआ बेचारा? कैसे ज़िन्दगी पार करेगा? हाय! अनाथ हो गया बेचारा।” उसका नाम ही बेचारा पड़ गया था। बस हर वक्त जब वह अपनी झोपड़ी से बाहर निकलता उसके कानों में वही आवाज़ें गूँजती। सुनने को मिलती जिसे सुनते-सुनते उसका मन परेशान हो उठता।
उस पर ईश्वर ने एक कृपा की थी। वो दृढ़ निश्चयी था। मज़बूत इरादों वाला। मां-बाप को गुज़रे छः महीने हो गये थे। धीरे धीरे वह भी अपने को समझाने लगा था। जब वो सोता तो उसे सपने में मां का कहा वाक्य कानों मे सुनायी देता, “बेटा जिसका दुनिया मे कोई नही होता उसका भगवान साथ देता है।” बस यही पंक्तियां उसके मस्तिष्क मे घर कर गयी थीं। वह ईश्वर के सामने बैठ रोज़ हाथ जोड़ता और कहता, “हे भगवान मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं कुछ कर सकूं और अपने साथ साथ औरों का भला कर सकूं। ईश्वर ने उसकी बात सुन ली। अब लड़के ने मन मे निश्चय किया उसे कुछ करना है कुछ बनना है।
कच्ची उम्र, भारी काम तो वह कर नहीं सकता था। पढा लिखा भी नहीं था। सो उसने हल्के काम करने शुरु किये। साहब लोगों की गाडियां साफ़ करता, जूते पालिश करता, साग सब्जी ला देता था। बदले में उसे भरपेट खाना व पगार मिल जाती थी। जितनी भी थी वह उससे सन्तुष्ट था। दस बरस बीत गये थे। अब वह जवान हो चला था। अब उसका काम पहले जैसा नहीं था बल्कि और बडे बडे काम करने लगा था वह।
वह लकडियां काटता उनके गठ्ठर बनाता और उन्हें शहर बेचने ले जाता।माल ट्रकों पर लदवाता और उन्हें सही जगह  भेजता था।वह काम के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान था। उसके काम से कभी किसी को कोई शिकायत नहीं रहती थी। सभी लोग उसके काम से खुश रहते थे।
एक दिन कि बात है जब वह लकड़ियों के गठ्ठर बना रहा था तो उसकी नज़र दूर पेड़ के पास बैठे एक लड़के पर पड़ी। जो बमुश्किल 7-8 साल का था। वह उस लड़के के पास गया प्यार से सिर सहलाते हुए पूछा, “क्या भूख लगी है?” उस लड़के ने हां में सिर हिलाया। तो वह लड़का अपना काम छोड़ कर पास की दुकान से दही जलेबी व ब्रेड ले आया और उस बच्चे से बोला-‘लो खाओ”। बच्चा भूखा तो था ही। किसी का प्यार पाकर उसकी आखों से झर झर आंसू बहने लगे। लडके ने कहा, “रो मत, पहले खा लो।” फ़िर लड़का झट्पट खाने क सामान चट कर गया। तुम कहां रहते हो? लड़के ने ना मे गर्दन हिलाई।

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श्रीमती पूनम श्रीवास्तव एक गृहणी है और 2008 से ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपना बहूमूल्य योगदान दे रहीं है। आज तक उनके द्वारा लिखे बाल गीत, बाल कहानियां व कविताएं देश के विभिन्न राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है। अब तक तीन पुस्तकें ‘रंग बिरंगी दुनिया (बाल साहित्य), चिट्ठी आई, अपना धन’ प्रकाशित हो चुकी है।

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