19 July, 2016

आ न कौआ....


आ! मेरे मुँडेर पर भी तू आ न कौआ
उसे टेर पर टेर दे कर बुला न कौआ 
मेरा मनचाहा पाहुन आये या न आये
झूठ- सच जोड़ मुझे फुसला न कौआ

रात की हर आहट ने है मुझे जगाया
कोई वंशी-धुन आ साँसों से टकराया
हिय की हलबलाहट क्या बताऊँ कौआ
बड़ी जुगत से सपनों को संयत कराया 

तिस पे रात ने पूछा यह भुलावा किसलिए ?
औ' नींद ने पूछा यह छलावा किसलिए ?
कुछ कहने को नहीं रह जाता है कौआ
जब देह भी पूछता है यह बुलावा किसलिए ?

अब भोर हुआ जग गए धरती-गगन
बोझ से झपीं पलकें है अभी तक नम
   

READ FULL :::: AMRITA TANMAY

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