06 April, 2016

बुलबुल / Sketches from Life

बिज्जू का इंटरव्यू अच्छा हो गया था और अब बस इंटर कॉलेज में नौकरी पक्की ही थी। घरवाले भी खुश और बिज्जू भी। घरवालों को अब लड़की ढूँढने की कसमसाहट होने लगी और उनका बस चलता तो बिज्जू की नौकरी जिस दिन लगती उसी दिन बिज्जू को घोड़ी पर भी चढ़ा देते ।

बिज्जू उर्फ़ बिजेंदर सिंह पढ़ाई में तेज़ थे और बढ़िया नंबर लाते थे। पर बात करने में सहमे से और शर्मीले से रहते थे। ज्यादा दोस्ती यारी नहीं रखते थे और किताबों में ही खोये रहते थे। बिज्जू लड़कियों से तो और ज्यादा कतराते थे जबकि दिल में गुदगुदी खूब होती जब लड़की पास में होती। बिज्जू की इच्छा होती कि छोरी से बात करूं, उसका हाथ अपने हाथ में ले लूं। पर ऐसा हो नहीं पता था क्यूंकि बिज्जू की जबान अटकने लग जाती थी और हाथ पैर लटकने लग जाते थे। मन ही मन कहते की मैं उससे क्यूँ बात करूं वो पहले करे। पर लड़की के जाने के बाद बिज्जू सोचते की अरे यार मैं ही बात कर लेता तो ठीक था - नहीं ऐसा गलत होता। ऐसा ठीक-गलत का द्वंद युद्ध जब भी मन में शुरू होता तो बहुत तलवारें चलती पर फिर बिज्जू खुद से कहते अरे क्या रखा है इनसे बात करने में हुंह! बस बिज्जू का सरेंडर।

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नौकरी के पहले दिन बिज्जू प्रधानाचार्य की बातचीत बड़ी गम्भीरता से सुन रहे थे। तभी एक महिला ने अंदर प्रवेश किया. प्रधानाचार्य ने महिला से कहा,
- आओ छवि बैठो। ये हैं बिजेंदर सिंह ये भी आज ही ज्वाइन कर रहे हैं।
बिज्जू ने मन ही मन सोचा कि प्रिंसिपल साब इससे बाद में मिल लेते पर शब्द जबान पर नहीं आये। बिज्जू ने जल्दी से अपने कपड़ों और जूतों का मुआयना किया, बटन और ज़िप चेक किये की ठीक से बंद हैं या नहीं। एक क्षण के लिए सोचा कि छवि को हेल्लो कहूँ या नमस्ते पर तब तक छवि ने अपना हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा दिया। बिज्जू सुन्न पड़ गए। उन्हें पता ही नहीं चला कि उन कुछ क्षणों में छवि से हाथ मिलाया था या नमस्ते की थी या हेल्लो कहा था।

खाली पीरियड में फैकल्टी रूम कई बार छवि नज़र आ जाती तो ठन्डे झोंके की तरह लगती। उससे बात करने के लिए बिज्जू तैयारी करने लगते। कपड़ों की सलवटें दूर करते, बाल सेट कर लेते और मौसम के बारे में पूछने के लिए मन ही मन प्रश्न तैयार कर लेते पर तब तक छवि उस दिन की अखबार पर चर्चा करने लग जाती और बिज्जू प्रश्न भूल जाते। अगले दिन बिज्जू अखबार का घोटा लगाकर आते तो छवि पिकनिक की बात करने लग जाती। अगर बिज्जू कोई शेर याद करके आते तो छवि किसी फिल्म की बात भटनागर सर से हंस हंस के करने लग जाती। बिज्जू शेर भूल कर तिलमिलाने लग जाते।

बिज्जू सोचने लगे कि ये भटनागर सर भी क्या चीज़ हैं? शादी शुदा होते हुए भी लेडीज़ से बतियाते रहते हैं। छवि को तो इनसे बात ही नहीं करनी चाहिए। पर वो तो उनकी मोटरसाइकिल पर भी बैठ जाती है। मैं भी बाइक खरीद लूं? मेरे साथ बैठी अच्छी लगेगी। पर क्या पता बैठेगी या नहीं? बिज्जू को अपने कानों में छवि की आवाज़ सुनाई पढने लगी, नाक में छवि की परफ्यूम बस गई, अपने रुमाल में छवि की छवि दिखने लगी और कंघी करें तो ऐसा लगे कि छवि के रेशमी बालों में कंघी फिसल रही है। कभी बिज्जू को लगता छवि बुलबुल की तरह चहक रही है और कभी लगता की छवि एक मूर्ती है। अब कॉलेज जाने से पहले बिज्जू का अपनी साज सज्जा में ज्यादा टाइम लगने लगा था।

कुछ दिनों बाद फैकल्टी रूम में छवि मिठाई के साथ अपनी शादी का कार्ड बाँट रही थी। बिज्जू का साँस रुक गया और बधाई शब्द भी बड़ी मुश्किल से जबान से निकला। किसी तरह हिम्मत जुटा कर बिज्जू बोले,
- मैं... मैं तो खुद आपसे शादी की बात करना ...
- बिजेंदर जी आपने देर कर दी।
छवि तो मुस्करा कर चल दी पर बिज्जू का दिन बमुश्किल निकला। शायद मैंने ही देर कर दी? गुमसुम बिज्जू शाम को घर पहुँच कर मम्मी से बोले,
- जो आपने किदवई नगर वाली लड़की बताई थी वो ठीक है। आप उनसे बात कर लो पर देर नहीं करना।

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