02 March, 2016

तर्क नहीं विचार

हिंदी फिल्मों में अपराध के चित्रण को लेकर भी लोग दो खेमों में बँटे हुए है।
कुछ लोग ये मानते हैं कि फ़िल्में लिखने वाले भी इसी समाज में रहते हैं, इसलिए जो कुछ समाज में हो रहा है, वही फिल्म के परदे पर भी आ रहा है।
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किन्तु इसके विपरीत सोचने वालों की भी कमी नहीं है। वे कहते हैं कि कहीं भूले-भटके अपवाद स्वरुप कोई बर्बर घटना घट गयी तो फिल्म वाले उसे मिर्च-मसाला लगा कर इस तरह फ़िल्मा देते हैं कि फिर वही एक घटना जगह-जगह घटने के लिए अपराधियों को उकसाती है और देखते-देखते समाज में उसका इस तरह महिमा-मंडन हो जाता है, कि लोग उसे अपराध कम ,मनोरंजन ज़्यादा समझने लगते हैं।
बेहतर हो कि हम इस विषय पर तर्क करने की जगह इस पर सोचें !
क्या ये टिप्पणियाँ आपको सही लगती हैं?
१. नकारात्मकता ज़्यादा संक्रामक होती है।  फ़िल्मी मारपीट देख कर लाखों बच्चे उसी तरह से रिएक्ट करते देखे जा सकते हैं, किन्तु फिल्मों में दिखाई गयी प्रवचनात्मक अच्छाइयों का उतना असर नहीं होता।
२. आपसी संबंधों को सँवारने-बिगाड़ने में फिल्मों की खासी भूमिका है।
३. अधिकांश फिल्मकारों को आपके अच्छे-बुरे से सरोकार नहीं होता, वे तो नया और पहले दिखाए जा चुके से आगे का दिखाना चाहते हैं।
४. कलाकारों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ फिल्म दर फिल्म उनकी "विशिष्टता" में तड़का लगा देती है। वे विश्वसनीयता या सामाजिक प्रभाव के चक्कर में नहीं पड़ते। उनका लक्ष्य तो  'देखने वाले की नज़र में घर करना' होता है।            

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