10 February, 2016

सर चंद्रशेखर वेंकटरमन : आधुनिक युग के महानतम भारतीय वैज्ञानिक

सन् 1921 की बात है। एक भारतीय वैज्ञानिक को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से विश्वविद्यालयीन कांग्रेस में भाग लेने के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ। इसी सिलसिले में वह इंग्लैंड गया। जब वह वापस पानी के जहाज से भारत लौट रहा था, तब रास्ते-भर वह भूमध्यसागर के जल के रंग को ध्यानपूर्वक देखता रहा तथा सागर के नीलेपन को निहारता रहा। उसे सागर के नीले रंग के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। उसके वैज्ञानिक मस्तिष्क में कई प्रश्न कोलाहल मचाने लगे। वह सोचने लगा- सागर का रंग नीला क्यों है? कोई और रंग क्यों नहीं? कहीं सागर आकाश के प्रतिबिंब के कारण तो नहीं नीला प्रतीत हो रहा है? समुद्री यात्रा के दौरान ही उसनें सोचा कि शायद सूर्य का प्रकाश जब जल में प्रवेश करता है तो वह नीला हो जाता है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक लार्ड रैले की मान्यता थी कि सूर्य की किरणें जब वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं से टकराती है तो प्रकाश सभी दिशाओं में प्रसारित हो जाता है और आकाश का रंग नीला दिखाई देता है, इसे रैले के सम्मान में ‘रैले प्रकीर्णन’के नाम से जाना जाता है। उस समय तक लार्ड रैले ने यह भी सिद्ध कर दिया था कि सागर का नीलापन आकाश के प्रतिबिंब के कारण है। उनके मतानुसार सागर का अपना कोई रंग नहीं होता। परंतु उस भारतीय वैज्ञानिक ने रैले की इस मान्यता को पूर्ण रूप से संतोषजनक नहीं माना। सागर के नीलेपन के वास्तविक कारण को जानने के लिए वह जहाज के डैक पर अपना उपकरण ‘स्पेक्ट्रोमीटर’ ले आया। और प्रयोगों में मग्न हो गया। वह अपने प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सागर का नीलापन उसके भीतर ही है, मतलब यह नीलापन आकाश के प्रतिबिंब के कारण नहीं, बल्कि जल के रंग के कारण है! इसका अभिप्राय यह था कि स्वयं सागर का रंग नीला है एवं यह नीलापन पानी के अंदर से ही उत्पन्न होता है।
बाद में वह भारतीय वैज्ञानिक इस परिणाम पर पहुँचा कि पानी के अणुओं (मॉलिक्यूल्स) द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के फलस्वरूप सागर एवं हिमनदियों का रंग नीला दिखाई देता है। उसनें गहन अध्ययन एवं शोध से यह भी बताया कि सामान्यत: आकाश का रंग नीला इसलिए दिखाई देता है क्योंकि सूर्य के प्रकाश में उपस्थित नीले रंग के प्रकाश की तरंग-लंबाई यानी ‘वेवलेंथ’ का प्रकाश अधिक प्रकीर्ण होता है। दरअसल, किसी रंग का प्रकीर्णन उसकी तरंग-लंबाई पर निर्भर करता है। जिस रंग के प्रकाश की तरंग-लंबाई सबसे कम होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे ज्यादा होता है तथा जिस रंग के प्रकाश की तरंग-लंबाई सबसे ज्यादा होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। लाल रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है, जबकि बैंगनी रंग का प्रकाश सर्वाधिक प्रकीर्ण होता है। आप सोंच रहे होंगें कि इस हिसाब से तो आकाश का रंग बैंगनी दिखाई देना चाहिए, फिर यह नीला क्यों दिखाई देता है? दरअसल, हमारी आँखें बैंगनी रंग की अपेक्षा नीले रंग के लिए अधिक सुग्राही होती हैं। इसलिए प्रकीर्णित प्रकाश का मिलाजुला रंग हल्का नीला प्रतीत होता है।
वह भारतीय वैज्ञानिक रास्ते-भर सागर के नीले रंग और सूर्य के अंतर्संबंध के बारे में प्रयोग करता रहा और सोचता रहा। भारत (कलकत्ता) लौटकर उस वैज्ञानिक ने इस विषय पर गहन अध्ययन एवं शोध प्रारम्भ कर दिया। और एक शोधपत्र प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशनार्थ भेज दिया, जो ‘प्रकाश का आणविक विकिरण’ शीर्षक से सन् 1922 में प्रकाशित हुआ। सागर के नीलेपन ने उस वैज्ञानिक को भौतिकी संबंधी एक अति महत्वपूर्ण खोज के लिए प्रेरित किया। जिसकी चर्चा आगे की जायेगी।
क्या आप जानतें हैं कि वह भारतीय वैज्ञानिक कौन थे? वह विलक्षण भारतीय वैज्ञानिक थे – सर चंद्रशेखर वेंकटरमन।
वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर, 1888 में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के एक छोटे से गांव थिरुवनैक्कवल में हुआ था। उनके पिता का नाम चन्द्रशेखर अय्यर था जो भौतिकी व गणित के अत्यंत विद्वान अध्यापक माने जाते थे। तथा उनकी माता का नाम पार्वती अम्मल था।



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