19 June, 2017

तुम्हारे चेहरे पर | मेरी आवाज


रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
दिखता मा सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

जब से होंठों ने होंठों को पाया है
तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

सच कहता हूँ वर्णन में ये छह ऋतुएँ
कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर



नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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सुख-दुख | ब्लॉग नई सोच


दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं।
फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं।

दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर।
दुख सहना किस्मत के खातिर...

दुख ही तो है सच्चा साथी
सुख तो अल्प समय को आता है।
मानव जब तन्हा  रहता है,
दुख ही तो साथ निभाता है।

फिर दुख से यूँ घबराना क्या?
सुख- दुख में भेद  बनाना क्या?

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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16 June, 2017

आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ फैंको | ऊंचाईयां


आखिर कब तक कितनी माताएं, कितने लाल जन्मती रहेंगी 
और देश को समर्पित करती रहेंगी।

वाह! कितनी महान हैं ये माताएं, पूजनीय हैं, वंदनीय है।
"आखिर कब तक कितनी माताओं के लाल शहीद होते रहेंगें।
सरहद पर तैनात सैनिक, हम सब की रक्षा की खातिर
क्या बस शहीद होने के लिये हैं, माना कि ये उनका कर्म है
धर्म है।

हाय! बड़ा दर्दनीय है ये, निन्दनीय है ये
वो भी किसी माँ के लाडले हैं, किसी के भाई,
मित्र और पति, क्या उनकी जान की कीमत बस
शहीद होना ही है।

"बस करो आतंकवाद के आगे यूँ हर पल मरना
वो चार मारे हमारे सैनिक उस पर फिर चार मारे छः मारे।
इस तरह आतंकवाद खत्म होने वाला नहीं
आंतकवादी को जड़ से उखाड़ फैंकना है।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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न्याय की वेदी | ब्लॉग एकलव्य


मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है!
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही
करता, मानुष! स्वयं हूँ, कहकर!
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन! निर्लज्ज़ 
तूँ, मरघट 

स्वर चीखतीं! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा द्रवित 
हृदय होता है! शोक की 
ऊष्मा, पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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'फादर्स डे' पर 15 अनमोल वचन | आपकी सहेली

दोस्तो, घर में ‘पिता’ एक ऐसा प्राणी हैं अक्सर जिसका त्याग उपेक्षित ही रहता हैं। वास्तव में भले ही पिता एक माँ की तरह अपनी कोख से बच्चे को जन्म न दे पाएं और अपना दूध न पिला पाएं मगर सच तो यह हैं कि हर बच्चे के जीवन में अपने पिता का स्थान बहुत बड़ा और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता हैं। पिता के सानिध्य में एक घने बरगद की छाया में मिलने वाली शांती सा एहसास होता हैं। हर साल जून के तिसरे रविवार को ‘फादर्स डे’ आता हैं। इस वर्ष 18 जून 2017 को ‘फादर्स डे’ हैं। आज हर कोई ‘फादर्स डे’ के दिन एक से एक सुंदर शायरी, कविता या अनमोल वचन सोशल मीड़िया पर शेयर करता हैं। इसी बात को ख्याल में रखते हुए 'आपकी सहेली' लाई हैं 15 अनमोल वचन.. वो भी इमेज के साथ! ताकि आपको इनमें से जो भी इमेज पसंद आएं वो आप फ्री में डाउनलोड कर के सोशल मीड़िया पर शेयर कर सको।


<<< सभी कोट्स पढ़ने के लिए 'आपकी सहेली' ब्लॉग पर जाएं >>>



ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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12 June, 2017

संघर्ष -यानि संग-हर्ष जियो | ऊंचाईयां


जीवन है तो संघर्ष है
यूं तो प्रकृति प्रदत्त सब और सम्पदा है
जीवन को तो जीना है, क्यों ना फिर
संग-हर्ष जियो।
समय का पहिया घूम रहा है
युग परिवर्तन हो रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
अविष्कार भी आवश्यकता का कारण है
मानव बुद्धि में उपजे अणुओं,
मानव की दिव्य आलौकिक बुद्धि
ने दुनियाँ को नये-नये आयाम दिये हैं
आकाश क्या अन्तरिक्ष में भी मानव के
कदम पढ़े है ।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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11 June, 2017

कालनिर्माता | ब्लॉग एकलव्य


स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी ये इकाई ही हमारे विक्राल शरीर का मूलभूत आधार है जिस प्रकार हमारे राष्ट्र का मूलभूत आधार 'किसान' ! परन्तु  आज उसी अन्नदाता की अनदेखी देश कर रहा है जो न्यायोचित नही,भविष्य में इसके विध्वंसक परिणाम होना तय है यदि हम नहीं चेते ! उस ईश्वररूपी संसार पालक को उसका हक़ नहीं दिया ! देश अपनी बर्बादी का स्वयं जिम्मेदार होगा। धन्यवाद 
"एकलव्य"

रे! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ? स्वप्नों में
झूल रहा
ब्रह्माण्ड जो तेरा
रचते हैं
पृथ्वी की काया
गढ़ते हैं!
सम्मान, तूँ उनका
तौल रहा

रे! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ? स्वप्नों में
झूल रहा

मृदा स्वर्ण! बनायें
कण से
फल जो हल का
लगायें! तल में
पाषाण खोद! उठायें
कर से
क्यूँ? उनका हक़
छीन रहा
जीवन है, उनका
दीन बना

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ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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09 June, 2017

घर के बड़े बुजुर्ग | ब्लॉग शब्दों की मुस्कुराहट


घर के बड़े बुजुर्ग
जो बाँटना चाहते है अपनी
उम्र का अनुभव
अपने बच्चो अपने पोते पोतियों के साथ
समझाना चाहते है उन्हें 
दुनियादारी के तौर तरीके
पर आज की पीढ़ी नहीं लेना चाहती
उनके अनुभव व विचार
जो सिर्फ अपनी ही चलाना चाहते है
लेकिन हमारे पढ़े लिखे होने से दुनियादारी
नहीं चलती
अनुभव का होना बहुत
ज़रूरी है

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संजय भास्कर जी 2009 से ब्लॉगिग कर रहें है और समाज के विभिन्न मुद्दों को कविताओं के माध्यम से समाज के सामने रखते है। इसके साथ ही भास्कर जी अपने ब्लॉग पर लेख व कहानियां भी लिखते है। ब्लॉगर भास्कर जी से ई-मेल sanjay.kumar940@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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08 June, 2017

कर्तव्य परायणता | ब्लॉग नई सोच


उषा की लालिमा पूरब में
नजर आई...
जब  दिवाकर रथ पर सवार,
गगन पथ पर बढने लगे...
निशा की विदाई का समय
निकट था...
चाँद भी तारों की बारात संग
जाने लगे...

एक दीपक अंधकार से लडता,
एकाकी खडा धरा पर...
टिमटिमाती लौ लिए फैला रहा 
प्रकाश तब...
अनवरत करता रहा कोशिश वह
अन्धकार मिटाने की...
भास्कर की अनुपस्थिति में उनके दिये
उत्तदायित्व निभाने की...

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संवेदना | ब्लॉग एकलव्य


प्रस्तुत रचना "संवेदना" इस संसार में प्राणीमात्र के स्वार्थपरक आचरण का वर्णन है। जब एक मानुष दूसरे दुःखी मानुष के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करता है ,समाज 'संवेदना' प्रकट करने वाले मानुष के प्रति उसी प्रकार अपना आचरण व्यक्त करता है जिस प्रकार प्रेमपाश में पड़ी कुँवारी नायिका अपने ही जन के कोप का भागी होती है।  धन्यवाद,  ''एकलव्य''  

मन ये मेरा बने है मानव
तन की छाया लगे है! दानव
क़ैद हूँ मैं, तेरे आँगन में
खड़ा प्रहरी तूँ बनके जीवन में 

लाख विचार करूँ! जो जन में
पात्र बनूँ बस, हँसी का जग में
एक अनुभव सी जागूँ! पल में
बनूँ मैं कांधा, दुःखी जगत में 

अंधकार में खो जाती हूँ
जुगनू सा मैं सो जाती हूँ
चलती जो विपरीत हवायें
खग बनकर! मैं उड़ जाती हूँ 

नहीं ज्ञात है कोई ठिकाना
बस समाज का ताना-बाना!
जिसमें फँसी-सी मैं रहती हूँ
निकल क़ैद से बस कहतीं हूँ!

बचपन में थोड़ी, नटखट हूँ
हुई! सहज जो यौवन आई
घरवाले बांधे हैं मुझको
मेरी नहीं तूं, धन है पराई 

ज्यों मैं घर की, चौखट लांगू
अपनों से बिसराती जाऊँ
कहे समाज कलंक! हूँ घर की
स्वयं के आँसूं पोंछे जाऊँ

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