August 25, 2016


'हर एसिड अटैक में प्रेम का एंगल नहीं होता'

बेटियों को समाज में बोझ समझा जाता है, उन्हे हर बात के लिए टोका जाता है। उन्हे परिवार का मान रखने और घरेलू कार्य करने के लिए ज्यादा उकसाया जाता है और उन्हे सलाह दी जाती है कि घर के कामों में ही ज्यादा रूचि रखनी चाहिए वरना ससुराल वाले क्या कहेंगे। आज भी समाज में मौजूद कई परिवारों में बेटों के मुकाबले बेटियों की उपेक्षा की जाती है और बेटो को ज्यादा लाड़-प्यार दिया जाता है। जबकि अधिकतर केसो में बेटे हमेशा अपने माता-पिता के पास सुख व दुख के समय नही होते है। लेकिन अधिकतर केसो में बेटी, हमेशा अपने माता-पिता के साथ होती है और उनके दुखो को समझती है।
कितने अफसोस की बात है कि आज के युग में भी बेटी को बोझ समझा जाता है। आज भी बहुत से घरो में बेटियों की परवरिश में भेदभाव रखा जाता है। ऐसा ही एक मामला हमने अपने नये पड़ोस में देखा, जब हम नये-नये यहां पर शिफ्ट हुए थे, हमने देखा कि पड़ोस में तीन बच्चे खेल रहे थे जिनमें दो लड़कियां थी और एक लड़का। लड़का दिखने में किसी अच्छे घर का लग रहा था और लड़कियां किसी गरीब घर से लग रही थी। हमने सोचा पड़ोस का लड़का होगा खेलने आया होगा। लेकिन अगले दिन पता चला कि वह तीनों भाई-बहन थे, हम चकरा गये कि बच्चों में इतना फर्क किया जा रहा है। एक सप्ताह में हमें अपने पड़ोसी की मनोदशा का पता चला कि ये सिर्फ लड़के के इच्छुक थे जबकि लड़की पैदा हो गई, जिसे सुनकर हमें बहुत बुरा लगा और अफसोस भी हुआ कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है।
भई! हमारे हमारे पास भी एक बेटी है जिसे हम दोनो पति-पत्नी ने भगवान से मन्नते कर मांगा है और जो हम दोनो की बहुत लाडली है, लेकिन बेटी के साथ के लिए भी भविष्य में हमारी इच्छा यही है कि एक बेटी और हो। हम चाहते है कि समाज में बेटी को लेकर बदलाव आये और उन्हे समझना होगा कि बेटियां बेटे से बढ़कर है। बेटियां एक नही दो घरो को रोशन करती है।
इसी के साथ हम आपको एक ऐसी बेटी की कहानी बता रहे है, जिसके पिता ने बेटी होने पर उसे और उसकी मां पर तेजाब डाल दिया था।


अनमोल रॉड्रीग्जहर : एक बेटी जिसे पिता ने ही दिया दर्द




अनमोल रॉड्रीग्जहर कहती हैं कि लोगों को लगता है कि एसिड से अगर कोई लड़की जली है तो जरूर किसी सिरफिरे आशिक का काम होगा, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ।
मुंबई की रहने वाली अनमोल रॉड्रीग्ज (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके साथ उनके पिता ने ऐसा किया, जब वो सिर्फ कुछ महीनों की थीं।
उनके पिता ने लड़की होने के गुस्से में उनकी माँ पर तब तेजाब फेंका था जब वो अनमोल को दूध पिला रही थीं।
अनमोल बताती हैं, ‘मेरे पिता इस बात से खुश नहीं थे कि मेरी मां ने एक बेटी को जन्म दिया है और इसलिए उन्होनें एक दोपहर मेरी माँ पर तेजाब फेंका। मेरी माँ ने मुझे ढंक लिया लेकिन वो खुद नहीं बच सकीं।’
एक तरफ जहां आज पीवी सिंधू और साक्षी मलिक के मेडल जीतने के बाद देश की बेटियों को दुआएं दी जा रही हैं, वहीं अनमोल के लिए जिंदा रहना भी मुश्किल था।
वो कहती हैं, ‘मेरे पिता को जेल हो गई और मेरे ननिहाल के लोगों ने कुछ दिन मेरा ईलाज करवाने के बाद मुझे बोझ समझ कर छोड़ दिया। मुंबई के एक अनाथाश्रम में फिर मुझे जगह मिली लेकिन ये तो सिर्फ शुरूआत थी।’
अनमोल 22 साल की हैं और उन्होंने अपना नाम सोशल मीडिया पर बदल लिया है और वो किसी एक धर्म को नहीं मानती हैं।
वो बताती हैं कि मेरे साथ हुई घटना के बाद जैसे भगवान से मेरा भरोसा ही उठ गया था। मैं किसी एक धर्म में भरोसा नहीं रख पा रही थी, लेकिन फिर मुझे लोगों ने हौसला दिया, जिंदा रहने की आस दी, वो अलग अलग धर्म के लोग थे और ऐसे में मैंने भी सभी धर्मों को मानने का निर्णय लिया। मेरे दोस्त मुझे अनमोल बुलाते थे और इसलिए मैंने अनमोल नाम को ही रख लिया।
अनमोल इन दिनों अपनी नौकरी को लेकर खासी परेशान हैं और वो इस बात को देखकर हैरान है कि लोग कैसे एसिड अटैक विक्टिम के साथ भेदभाव करते हैं।
उनका कहना है कि एक साल पहले एल एंड टी कंपनी में अंकाउंट्स विभाग की नौकरी से मुझे कम अनुभव के आधार पर निकाल दिया गया और इसके बाद से मैं जहां भी नौकरी मांगने जाती हूं वहां अजीब बर्ताव किया जाता है। कोई बोलता नहीं लेकिन चेहरे के भाव से समझ आ जाता है कि वो मुझे देखकर घृणा महसूस करते हैं।
अनमोल मुंबई के जिस अनाथालय में रहती थी वहां 18 साल की उम्र के बाद बच्चों को रखने की व्यवस्था नहीं है।
ऐसे में अनमोल को काम तलाशना एक मजबूरी थी। वो कहती हैं, ‘एक आम आदमी हमारा दर्द नहीं समझ सकता, 22 साल पहले मैं जली थी, लेकिन आज भी मेरे चेहरे और आँखो से पानी आ जाता है।’
‘धूप में जला हुआ हिस्सा बुरी तरह से जलता है, पसीना कई बार खराब आँख में चला जाता है तो मिर्च लगने जैसी जलन होती है। इस सबके लिए जो दवाएं और सर्जरी जरूरी है वो महंगी हैं और इसके लिए मेरे लिए पैसे कमाना जरूरी है।
एसिड अटैक विक्टिम्स के लिए तो कई तरह के कैंपेन चलाए जाते हैं, ऐसे में क्या वहां से अनमोल को कोई मदद नहीं मिली?
आगरा के मशहूर ‘शीरोज’ कैफे को सिर्फ एसिड अटैक विक्टिम चलाती हैं। वहां काम कर चुकी अनमोल बताती हैं, इन ‘सोशल’ चीजो का तरीका बहुत अलग होता है। वहां मीडिया ज्यादा आता है और ग्राहक कम, वहां आपको एक ठिकाना मिल सकता है लेकिन जिंदगी चलाने के लिए आसरा नहीं।
अनमोल के साथ 1994 में एसिड अटैक की घटना हुई थी। वो कहती हैं कि आजकल सरकार की ओर से एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद की जाती है लेकिन उनके साथ यह तब हुआ जब इन मामलों पर कोई आवाज नहीं उठती थी।
अनमोल बिना किसी का नाम लिए कहती हैं, ‘कुछ पीड़ितों को मीडिया सिलेब्रिटी बना दिया गया है लेकिन बाकी लड़कियों का क्या? हमें तो लोग देखना भी पसंद नहीं करते। आज मैं फिल्म भी अकेले देखने जाती हूं और भले ही एक दिन आप मेरे साथ ले जाएंगे, पर क्या आप मेरे साथ मेरा दर्द बाँट सकते हैं?

August 23, 2016


मिनटों में बनाएं मकई के दानों का उपमा


“आपकी सहेली” की हमेशा यहीं कोशिश रहती है कि आपको व्यंजन बनाने की आसान विधि बता सकूं, जो बनाने में कम वक्त लगें और कम मेहनत में स्वादिष्ट व्यंजन बन भी जाएं। क्योंकि भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादा मेहनत वाले व्यंजन, हम चाह कर भी ज्यादा नहीं बना पाते! इसी क्रम में आज हम बनाते है, मकई के दानों का उपमा।

सामग्री

  • मकई के दाने- 2 कप
  • प्याज़- 1/2 कप बारीक़ कटा हुआ 
  • टमाटर- 1/2 कप बारीक़ कटे हुए 
  • शिमला मिर्च- 1/2 कप बारीक़ कटी हुई 
  • हरी मिर्च- 1-2 नग बारीक़ कटी हुई 
  • हरा धनिया- 1/4 कप बारीक़ कटा हुआ 
  • राई या सरसों- 1/2 छोटी चम्मच
  • जीरा- 1/2 छोटी चम्मच
  • तेल- 1 बड़ा चम्मच
  • नमक- 1 छोटी चम्मच
  • लाल मिर्च पावडर- 1 छोटी चम्मच
  • हल्दी- 1/2 छोटी चम्मच

विधि

मकई के दानों को कूकर में मध्यम आंच पर दो सिटी आने तक उबाल लीजिए। कूकर ठंड़ा होने पर ये दाने चलनी में पलटा दीजिए ताकि अतिरिक्त पानी निकल जाएं। दानों को मिक्सर में दरदरा पीस लीजिए। ध्यान दीजिए कि दानों को एकदम महीन नहीं पिसना है।
कढ़ई में एक बड़ा चम्मच तेल गर्म कर कर राई एवं जीरा डालिए। कटी हुई हरी मिर्च, शिमला मिर्च और प्याज़ डाल कर इन्हें थोड़ा पकने दीजिए। प्याज़ ब्राउन होने पर टमाटर डालिए। नमक, लाल मिर्च और हल्दी डाल दीजिए। चम्मच से हिलाते हुए पकने दीजिए। अब मकई के पिसे हुए दाने डालिए। 5-7 मिनट कौचें से बराबर हिलाते हुए पकने दीजिए। उपर से हरा धनिया बुरका दीजिए। लीजिए तैयार है मकई का स्वादिष्ट उपमा। खूद भी खाइए और सभी को खिलाकर तारीफ़ पाइए।
Tips : यदि स्विट कॉर्न है तो सिर्फ दो सिटी तक दानों को उबाले। लेकिन यदि साधे भुट्टे है तो मध्यम आंच पर पांच मिनट और उबलने दीजिए।

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। जिससे पाठक लाभान्वित हो सकते है।

August 17, 2016


जीवन में चुनौतियों का सामना कैसे करें?


जापानी लोगों को ताजा मछली खाना बहुत ज्यादा पसंद हैं। लेकिन जापान के पास के समंदर में से मछलियाँ कुछ सालों के बाद कम होने लगी। इसलिए जापान के लोगों की मछलियों की माँग पुरी करने के लिए फिशिंग बोट्स ज्यादा बडी होने लगी और वो समंदर में ज्यादा दूर तक जाने लगी। जितना दूर बोट जाती उतना ही उन्हें वापस आने में ज्यादा समय लगता और अगर वापस आनेमें ज्यादा दिन लगते तो उन्होंने पकड कर लाइ मछलियाँ ताजी नहीं रहती थी। जापानी लोगों को उसका स्वाद पसंद नहीं आने लगा। इसलिए मछलियों की माँग कम होनें लगी।   इस समस्या का समाधान करनें के लिए फिशिंग कंपनीयों ने उनकी बोट पर फ्रिजर रखवा दिए। अब मछुआरे मछलियाँ पकडकर उन्हें समंदर मे ही बोट पर रखें फ्रिजर में रखने लगे। फ्रिजर की वजह से अब मछलियाँ पहले से ज्यादा ताजी रहने लगी और परिणाम स्वरुप बोट समंदर में और ज्यादा दूर जाने लगी और ज्यादा समय के लिए समंदर में रहने लगी। परंतु जापानी लोगों को ताजी मछली और फ्रिजर में रखी मछली दोनों के स्वाद का अंतर पता चलता था। उन्हें फ्रिजर में रखी हुइ मछली का स्वाद पसंद नहीं आया। फिर इन मछलियों की माँग कम हुई इसलिए उनकी कीमत भी कम हो गई।
अब इस समस्या का समाधान करने के लिए मछली पकडने वाली कंपनीयों ने बोट पर फिश टैंक स्थापित किए। इस से मछूवारे मछली पकडकर उन्हें इस फिश टैंक में रखते थे। कुछ दिन फिश टैंक में इधर उधर घुमने के बाद मछलियाँ शांत हो गई। मछलीयाँ जिंदा तो रहती थी परंतू थक जाती और सुस्त हो जाती थी। जापानी लोगों को अभी भी इस मछली का स्वाद ताजा मछली जैसा नहीं लगा। उन्हें ये मछलीयाँ भी पसंद नहीं आई।
जापानी लोगों को एकदम ताजा और जीवंत मछली का स्वाद ज्यादा पसंद था। उन्हें सुस्त और निस्तेज मछलियाँ पसंद नही थी। तो जापानी फिशिंग कंपनियों ने इस समस्या का समाधान कैसे किया? उन्होंने जापानी लोगों के पसंद की ताजा मछलियाँ कैसे मिली? कैसे जापानियों ने मछलियों को ताजा रखने की व्यवस्था की?
मछलियों को ताजा रखनें के लिए जापानी फिशिंग कंपनीयों ने अभी भी मछलीयाँ उसी फिश टैंक में ही रखीं जो उन्होंने बोट पर स्थापित किए थें। परंतू इस बार उन्होंने हर एक फिश टैंक में एक छोटी शार्क मछली को बाकी मछलियों के साथ रखा। वो छोटी शार्क मछली कुछ मछलियों को खा जाती हैं परंतू बाकी बची ज्यादातर मछलियाँ बहुत ही सक्रिय और ताजी अवस्था में जापानी लोगों को मिलने लगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब शार्क मछली के बाकी मछलियों के साथ टैंक में रहनें से बाकी मछलियों को चुनौती मिली। वो जिंदा रहने के लिए सतर्क रहने लगी।
ऊपर की कहानी पढ कर आपको समझ में आया होगा कि चुनौतियाँ जीवन के लिए जरुरी होती हैं। हमारे आसपास भी ऐसे लोग हैं जो हमेशा थके हुए, सुस्त और निस्तेज जीवन जी रहे होते हैं। क्या हमें भी हमारे जीवन में जागरुक, सतर्क और कार्यरत रहने के लिए शार्क मछली जैसी चुनौतियाँ जरुरी हैं? इसका जवाब हैं हाँ, जरुरी हैं। शार्क मछली मतलब नई चुनौतियाँ, नए बदलाव जो हमें हमेशा सतर्क रखते हैं। जितना आप खुद को समझदार, बुद्धिमान और सक्षम बनाते रहते हैं उतना आपको नई चुनौतियों का सामना करने में मजा आता हैं।
अगर आपकी चुनौतियाँ समाधान करने लायक हैं और आप हमेशा उनका सामना करके उनका समाधान खोजते हैं तो आप जीवन में सफल व्यक्ति कहलाऐंगे। चुनौतियों के बारें में सोचकर आपमें नई उर्जा का संचार होगा। आप नई चीजें, नए हल ढूँढ़ने के लिए उत्साही होंगे और ये सब करके आपको मजा आएगा, आप खुद को खुश, सक्रिय और नवचेतना से भरपूर महसूस करेंगें।

चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव-


  • नई चुनौतियों से दूर भागने के बजाय इनका डटकर सामना करें। चुनौतियों का सामना करके उन्हें सुलझाने का मजा लें। अगर आपके सामने बहोत बडी और बहोत ज्यादा संख्या में चुनौतियाँ हैं तो इस से डरे नहीं, न तो हार मानें। इनका सामना करनें के लिए दृढ़ संकल्प करें और अधिक ज्ञान और अधिक मदद हासिल करें।
  • निराशा हमारे जीवन मे ठीक उसी तरह होती हैं जैसे सड़क पर गतिरोधक होता हैं। गतिरोधक हमें धीमा जरुर करता हैं परंतु उस से आगे हमें अच्छी सडक मिलती हैं। वैसे ही नैराश्य हमें जीवन में धीमा करता हैं। परंतु इस निराशा में ज्यादा समय ना रहें। इस से आगे बढ़े।
  • आपको जो चाहिए वो जब आपको नहीं मिलता तब आप निराश होते हैं, आपको बुरा लगता हैं ऐसे समय धीरज रखें और खुश रहने की कोशिश करें। क्योंकि भगवान ने जरुर आपके लिए कुछ न कुछ अच्छा सोचा होगा। जब आपके साथ अच्छा या बुरा कुछ भी होता हैं तब इस पर ज्यादा सोचे नहीं। जीवन में हर घटना का कोई न कोई मकसद होता हैं। कोशिश करें की आप ज्यादा से ज्यादा खुश रहें, ज्यादा हँसे।
  • भगवान ने हमे ये वादा नहीं किया था कि आपके जीवन में सिर्फ सुख होगा दुःख नहीं, हँसी होगी आँसू नहीं, सूरज होगा बारिश नहीं, लेकिन भगवान ने हमें दु;ख सहने के लिए हिम्मत और सामर्थ्य जरुर दिया, आँसू पोछने के लिए अपने लोग दिए और अँधेरे में चलने के लिए प्रकाश जरुर दिया है।

कोई भी अपने अतीत में जाकर एक नयी शुरूवात नहीं कर सकता। लेकिन हर कोई आज और अभी से नयी शुरूवात करके नया अंत कर सकता हैं। आगे बढ़ो और जीवन में चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार हो जाओ।

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अतुल राजे जाधव 2015 से ब्लॉग का संचालन एवं लेखन कर रहे है। इनके ब्लॉग पर पोस्ट कम है लेकिन स्तरीय एवं पठनीय और प्रेरक है। जिसका पाठको को लाभ मिल सकता है।

August 16, 2016


कौन किसका है - Hindi Moral story


मैंने सुना है, एक फकीर के पास एक युवक आता था। वह युवक कहता था कि मुझे भी संन्यास की यात्रा करनी है। सूफियों के रंग-ढंग मन को भाते है। लेकिन क्या करूॅं, पत्नी है और उसका बड़ा प्रेम है। क्या करूॅं बच्चें हैं, और उनका मुझसे बड़ा लगाव है। मेरे बिना वे न जी सकेंगे। मैं सच कहता हूॅं, वे मर जाएॅंगे। मैं पत्नी से संन्यास की बात भी करता हूॅं तो वह कहती हैं, फांसी लगा लूॅंगी।
उस फकीर ने कहा, ‘तू ऐसा कर। कल सुबह मैं आता हूॅं। तू रातभर, एक छोटा-सा प्रयोग देता हूॅं, इसका अभ्यास कर ले और सुबह उठकर एकदम गिर पडना।‘ प्रयोग दिया सांस को साधने का कहा इसका रातभर अभ्यास कर ले, सुबह तू सांस साध कर पड जाना। लोग समझेंगे, मर गया। फिर बाकी मैं समझा लूॅंगा।
उसने कहा, चलो। क्या हर्ज़ है? देख लें करके। क्या होगा इससे?
महात्मा ने कहा की तुझको इससे दिखाई पड़ जाएगा। कौन-कौन तेरे साथ मरता है। पत्नी मरती है, बच्चे मरते, पिता मरते, माॅं मरती, भाई मरते, मित्र मरते कौन-कौन मरता है, पता चल जाएगा। एक दस मिनट तक सांस साध कर पड़े रहना हे, बस। सब ज़ाहिर हो जाएगा। तू मौजूद रहेगा, तू देख लेना, फिर दिल खोलकर सांस ले लेना, फिर तुझे जो करना हो कर लेना।
वह मर गया सुबह। सांस साध ली। पत्नी छाती पीटने लगी, बच्चे रोने लगे, माॅं-बाप चीखने लगे, पड़ोसी इकटठे हो गये। वह फकीर भी आ गया इसी भीड में भीतर। फकीर को देखकर परिवार के लोगों ने कहा कि आपकी बड़ी कृपा, इस मौके पर आ गये। परमात्मा से प्रार्थना करो। हम तो सब मर जाएंगे। बचा लो किसी तरह। यह हम सबके सहारे थे।
फकीर ने कहा, घबराओ मत। यह बच सकता है। लेकिन मौत जब आ गयी तो किसी को जाना पडे़गा। तो तुम में से जो भी जाने को राजी हो, वह हाथ उठा दे। वह चला जाएगा यह बच जाएगा। इसमें देर नहीं है, जल्दी करो।
एक-एक से पूछा। पिता से पूछा। पिता ने कहा, अभी तो बहुत मुश्किल है। मेरे और भी बच्चे हैं कोई यह एक ही मेरा बेटा नहीं हैं। उनमें कई अभी अविवाहित है। कोई अभी स्कूल में पढ़ रहा है। मेरा होना तो बहुत जरूरी है, मैं कैसे जा सकता हॅू।
माॅं ने भी कुछ बहाना बताया। बेटों ने भी कहा कि हमने तो अभी जीवन देखा ही नहीं। पत्नी से पूछा, पत्नी के आसु एकदम रूक गये। उसने कहा, अब ये तो मर ही गये और हम किसी तरह चला लेंगे । अब आप झंझट न करो और।
फकीर ने कहा, अब उठ। तो वह आदमी आॅंख खोलकर उठ गया। उसने कहा, अब तेरा क्या इरादा है? उसने कहा, अब क्या इरादा, आपके साथ चलता हॅू। ये तो मर ही गये। अब ये लोग चला लेंगे। देख लिया राज़ समझ गये, सब बातों की बात थी। कहने की बातें थीं।

Moral: कौन किसके बिना रूकता है। कौन कब रूका है। कौन किसको रोक पाया है।
दृष्टि आ जाए तो वैराग्य उत्पन्न होता है। उस घड़ी उस युवक ने देखा। इसके पहले सोचा था बहुत। इस घड़ी दर्शन हुआ।

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धीरेन्द्र गोयल जी द्वारा संचालित ब्लॉग 99 हिन्दी में आपको प्रेरक प्रसंग, हिन्दी कहानियां, सुविचार, जनरल नॉलेज एवं सेल्फ इंप्रूवमेंट से संबधित लेख पढ़ सकते है। इसके साथ ही आपको यहां पर व्हाट्सअप स्टेटस और निंबध व प्रेरक जिवनियां भी पढ़ने के लिए मिलेगी।

August 15, 2016


असली स्वतंत्रता दिवस - Poem


आज स्वतंत्रता दिवस है, पर,
दिल यह कहने को विवश है,
क्या यहाँ है सच्ची स्वतंत्रता?
हर पथ पर है बस परतंत्रता...

जन गण मन अधिनायक जय,
शायद यह है भी, या नहीं है?
परन्तु क्या 70 वर्षों बाद भी,
अपने देश की जय है? नहीं है...

बरसों बाद भी हर एक शख़्स,
परेशानियों से लड़ रहा है,
झूठी सामाजिक अराजकता से,
चुपचाप नाक़ाम भिड़ रहा है...

यहाँ की व्यवस्था बड़ी निराली है,
जो करती चाटुकारों की रखवाली है, 
जो आँखों के रहते हुए भी अंधे हैं,
कान-ज़बां रखकर भी गूंगे-बहरे हैं...

विकास तो बख़ूबी हो रहा है,
पर मज़े उसके कौन ले रहा है?
और यदि नहीं हो रहा है, तो,
कौनसा कोई ज़िम्मेदारी ले रहा है...

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तुषार रस्तोगी जी 2010 से ‘तमाशा-ए-जिन्दगी’ ब्लॉग का संचालन एवं लेखन कर रहे है। तुषार जी अब तक 300 से अधिक रचना पोस्ट लिख चुके है। आप अधिकतर कविताओ का लेखन करते है और विविध विषयों को अपनी रचनाओं को शामिल करते है। आपको फेसबुक पर Follow करें।


आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका थी उषा मेहता की


भारत छोड़ो आंदोलन के समय खुफिया कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण पूरे देश में विख्यात हुई उषा मेहता ने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी और आजादी के बाद वह गांधीवादी दर्शन के अनुरूप महिलाओं के उत्थान के लिए प्रयासरत रही।
उषा ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अपने सहयोगियों के साथ14 अगस्त 1942 को सीक्रेट कांग्रेस रेडियो की शुरूआत की थी। इस रेडियो से पहला प्रसारण भी उषा की आवाज में हुआ था। यह रेडियो लगभग हर दिन अपनी जगह बदलता था, ताकि अंग्रेज अधिकारी उसे पकड़ न सकें। इस खुफिया रेडियो को डा. राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन सहित कई प्रमुख नेताओं ने सहयोग दिया। रेडियो पर महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं के रिकार्ड किए गए संदेश बजाए जाते थे।
तीन माह तक प्रसारण के बाद अंतत: अंग्रेज सरकार ने उषा और उनके सहयोगियों को पकड़ा लिया और उन्हें जेल की सजा दी गई। गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार के अनुसार उषा एक जुझारु स्वतंत्रता सेनानी थी जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वह बचपन से ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थी और उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए कई कार्यक्रमों में बेहद रुचि से कार्य किया।
आजादी के बाद भी उषा मेहता गांधीवादी विचारों को आगे बढ़ाने विशेषकर महिलाओं से जुडे़ कार्यक्रमों में काफी सक्रिय रही। उन्हें गांधी स्मारक निधि की अध्यक्ष चुना गया और वह गांधी शांति प्रतिष्ठान की सदस्य भी थीं। 25 मार्च 1920 को सूरत के एक गांव में जन्मी उषा का महात्मा गांधी से परिचय मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही हो गया था। कुछ समय बाद राष्ट्रपिता ने उनके गांव के समीप एक शिविर का आयोजन किया जिससे उन्हें बापू को समझने का और मौका मिला। इसके बाद उन्होंने खादी पहनने और आजादी के आंदोलन में भाग लेने का प्रण किया।


उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक डिग्री ली और कानून की पढ़ाई के दौरान वह भारत छोड़ो आंदोलन में पूरी तरह से सामाजिक जीवन में उतर गई। सीक्रेट कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण उन्हें चार साल की जेल हुई। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में 1946 में रिहा किया गया।
आजादी के बाद उन्होंने गांधी के सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों पर पीएचडी की और बंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया। बाद में वह नागरिक शास्त्र एवं राजनीति विभाग की प्रमुख बनी। इसी के साथ वह विभिन्न गांधीवादी संस्थाओं से जुड़ी रही। भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया। उषा मेहता का निधन 11 अगस्त 2000 को हुआ।

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शिवम मिश्रा 2009 से ब्लॉग ‘बुरा-भला’ का संचालन और लेखन कर रहे है। मिश्रा जी अबतक 400 से अधिक पोस्ट लिख चुके है। इस ब्लॉग पर आपको विभिन्न विषयों से संबधित सामग्री मिल सकती है। मिश्रा जी को फेसबुक पर Follow करें। 


आखिर इस आज़ादी से हमें क्या मिला?

आज़ादी : क्या खोया, क्या पाया?


15 अगस्त याने स्वतंत्रता दिन के आसपास सोशल मीडिया पर देश की सकारात्मक छबी से ज्यादा नकारात्मक छबी पेश करनेवाली पोस्ट्स प्रकाशित होती है। वो सब पढ़कर मन में स्वाभाविक सवाल आता है कि आखिर इस आज़ादी से हमें क्या मिला? हमारे पूर्वजों ने क्या इसी आज़ादी के लिए खून बहाया था? हताशा में कई बुजुर्ग तो यहां तक कह देते है कि इससे तो अंग्रेजों का शासन ही अच्छा था! जिस देश में आए दिन बहन-बेटियों पर बलात्कार हो, युवा देश हित के कार्यों के बजाय सिर्फ नारेबाज़ी कर कर रातों रात हीरो बनना चाहते हो, वहां ये सवाल मन में उठना स्वाभाविक है। हाल ही में कश्मीर के संदर्भ में नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि “जिन युवाओं के हाथों में किताबें और लैपटॉप होने चाहिए, मन में सपने होने चाहिए, उनके हाथों में पत्थर होते है!”
आज कुछ मुट्ठी भर लोग, हम सवा सौ करोड़ भारतीयों की बुद्धि को ललकार रहें है। वो हमें क्षेत्रीयता और जातियता के नाम पर उकसा रहें है। और हम सवा सौ करोड़ भारतीय असलियत जानते-समझते हुए भी उनके चंगुल में फँस रहें है। आज अफ़ज़ल गुरु, बुरहान वानी जैसों को शहीद बताना, भारत माता की जय बोलना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बन गई है। ट्रेन हो, मॉल हो या बाजार हो, कब छिपाकर रखा बम फट जाएगा बता नहीं सकते। सुबह घर से निकला इंसान, शाम को सही-सलामत घर लौटेगा की नहीं कुछ गारंटी नहीं। हमारे नेता लोग भी युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोज़गार देने के तरफ अपना ध्यान लगाने के बजाय युवाओं को आरक्षण का छूनछूना थमा रहें है।
इन सब बातों से ऐसा लगता है कि हमारे देश में सब गलत ही गलत हो रहा है। कहीं भी, कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि ये सब बातें सिक्के की सिर्फ एक बाज़ू है! हमारा मीडिया नकारात्मक खबरों को प्राधान्य देता है इसलिए हमारे मन में भी देश की नकारात्मक छबी पनपती है। सिक्के की दूसरी बाज़ू इससे और अधिक उजली एवं साफ है। कितने भी बिगड़े हालात पर हम खुलकर लिख-बोल सकते है, ये क्या कम है? किसी महान व्यक्ति ने कहा है “ये मत सोचों कि इस देश ने तुम्हें क्या दिया, बल्कि ये सोचों तुमने देश को क्या दिया?” ये पंक्तियां हमें हमारी जिम्मेदारियों का एहसास कराती है। जे एन यू में छात्र संघ ने जिस तरह से देशद्रोह के नारे लगाए, क्या ऐसे नारे लगाने की आज़ादी होनी चाहिए?

<<< पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>



ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। जिससे पाठक लाभान्वित हो सकते है।


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