28 June, 2017

मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में | मेरी आवाज


प्यार भी  दुश्वार है दुनियाँ की  नजर में
साहिल पे बहुत शोर है चल बीच भंवर में

इक शख़्स अपनी हार से इतना ख़फा हुआ
कहता है जहर और दे कश्कोले-जहर में

सोचता था तेरे नाम का एक शेर लिखूंगा
आज तक उलझा रहा ग़ज़लों के बहर में

लौट के आना था सो मैं आ गया मगर
मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में

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आजम गढ़ के रहने वाले राजेश कुमार राय जी 2015 से ब्लॉगिग कर रहें है और शब्दों को कविताओं में पिरोकर पाठकों के लिए पेश कर रहें है।  ब्लॉगर से ई-मेल pratistharai32@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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26 June, 2017

मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा | ब्लॉग एकलव्य


अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा
हवाओं को लपेट के तू, आंधियाँ बना-बना
लहू की गर्मियों से तू, मशाल तो जला -जला
जला दे ग़म के शामियां, नई सुबह तो ला ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा

भूल जा तूँ जिंदगी, मौत को गले लगा
झूठ की जो लालसा, मन से तू निकाल दे
सपनों के पुलिंदों को, कदमों से ठोकर मार दे
क़िस्मत मिलेगी धूल में, माथे से लगा ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा

सोच मत तू है धरा, पंख तो फैला ज़रा
उड़ जा आसमान में, विश्वास से भरा-भरा
देख मत यूं  मुड़ के तू, लौटने के वास्ते

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ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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बचपन से हमने देखा है | ब्लॉग ऊंचाईयां


भारत की पृष्ठ भूमि पर हर 
मज़हब शान से जीता है।
बचपन से हमने देखा है,
चाहे मुबारक ईद हो या दीवाली
हमारे लिये अवकाश संग खुशियों की सौग़ात का 
तोहफ़ा होता है।
हम तो ईद हो या दीवाली सबमें प्रफुल्लित होते हैं।
मुबारक ए ईद पर भी इबादत अमन चैन की
दुआ संग हर्षोल्लास से खुशियां बाँटी जाती है
और जी जाती है।
दीपावली पर भी प्रभु प्रार्थना संग
खुशियाँ बांटी जाती हैं और ज्ञान के
प्रकाश का उजाला किया जाता है ।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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समय तू पंख लगा के उड़ जा | ब्लॉग नई सोच


माँँ! मुझे भी हॉस्टल में रहना है, मेरे बहुत से दोस्त हॉस्टल में रहते हैं, कितने मजे है उनके!...
हर पल दोस्तों का साथ... नहीं कोई डाँट-डपट... न ही कोई किचकिच....
मुझे भी जाना है हॉस्टल, शौर्य अपनी माँ से कहता.... 
माँ उसे समझाते हुए कहती "बेटा! जब बड़े हो जाओगे तब तुम्हे भी भेज देंगे हॉस्टल... 
फिर तुम भी खूब मजे कर लेना"...
समझते समझाते शौर्य कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला 
और आगे की पढ़ाई के लिए उसे भी हॉस्टल भेज दिया गया। 
बहुत अच्छा लगा शुरू-शुरू में शौर्य को हॉस्टल मेंं... 
परन्तु जल्दी ही उसे घर और बाहर का फर्क समझ में आने लगा...
अब वह घर जाने के लिए छुट्टियों का इन्तजार करता है,
और घर व अपनोंं की यादों में कुछ इस तरह गुनगुनाता है...

समय तू पंख लगा के उड़ जा...
उस पल को पास ले आ...
जब मैंं मिल पाऊँ माँ -पापा से,
माँ-पापा मिल पायें मुझसे
वह घड़ी निकट ले आ...
समय तू पंख लगा के उड़ जा।

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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19 June, 2017

तुम्हारे चेहरे पर | मेरी आवाज


रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
दिखता मा सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

जब से होंठों ने होंठों को पाया है
तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

सच कहता हूँ वर्णन में ये छह ऋतुएँ
कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर



नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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सुख-दुख | ब्लॉग नई सोच


दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं।
फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं।

दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर।
दुख सहना किस्मत के खातिर...

दुख ही तो है सच्चा साथी
सुख तो अल्प समय को आता है।
मानव जब तन्हा  रहता है,
दुख ही तो साथ निभाता है।

फिर दुख से यूँ घबराना क्या?
सुख- दुख में भेद  बनाना क्या?

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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16 June, 2017

आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ फैंको | ऊंचाईयां


आखिर कब तक कितनी माताएं, कितने लाल जन्मती रहेंगी 
और देश को समर्पित करती रहेंगी।

वाह! कितनी महान हैं ये माताएं, पूजनीय हैं, वंदनीय है।
"आखिर कब तक कितनी माताओं के लाल शहीद होते रहेंगें।
सरहद पर तैनात सैनिक, हम सब की रक्षा की खातिर
क्या बस शहीद होने के लिये हैं, माना कि ये उनका कर्म है
धर्म है।

हाय! बड़ा दर्दनीय है ये, निन्दनीय है ये
वो भी किसी माँ के लाडले हैं, किसी के भाई,
मित्र और पति, क्या उनकी जान की कीमत बस
शहीद होना ही है।

"बस करो आतंकवाद के आगे यूँ हर पल मरना
वो चार मारे हमारे सैनिक उस पर फिर चार मारे छः मारे।
इस तरह आतंकवाद खत्म होने वाला नहीं
आंतकवादी को जड़ से उखाड़ फैंकना है।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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न्याय की वेदी | ब्लॉग एकलव्य


मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है!
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही
करता, मानुष! स्वयं हूँ, कहकर!
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन! निर्लज्ज़ 
तूँ, मरघट 

स्वर चीखतीं! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा द्रवित 
हृदय होता है! शोक की 
ऊष्मा, पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर!
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर!

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'फादर्स डे' पर 15 अनमोल वचन | आपकी सहेली

दोस्तो, घर में ‘पिता’ एक ऐसा प्राणी हैं अक्सर जिसका त्याग उपेक्षित ही रहता हैं। वास्तव में भले ही पिता एक माँ की तरह अपनी कोख से बच्चे को जन्म न दे पाएं और अपना दूध न पिला पाएं मगर सच तो यह हैं कि हर बच्चे के जीवन में अपने पिता का स्थान बहुत बड़ा और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता हैं। पिता के सानिध्य में एक घने बरगद की छाया में मिलने वाली शांती सा एहसास होता हैं। हर साल जून के तिसरे रविवार को ‘फादर्स डे’ आता हैं। इस वर्ष 18 जून 2017 को ‘फादर्स डे’ हैं। आज हर कोई ‘फादर्स डे’ के दिन एक से एक सुंदर शायरी, कविता या अनमोल वचन सोशल मीड़िया पर शेयर करता हैं। इसी बात को ख्याल में रखते हुए 'आपकी सहेली' लाई हैं 15 अनमोल वचन.. वो भी इमेज के साथ! ताकि आपको इनमें से जो भी इमेज पसंद आएं वो आप फ्री में डाउनलोड कर के सोशल मीड़िया पर शेयर कर सको।


<<< सभी कोट्स पढ़ने के लिए 'आपकी सहेली' ब्लॉग पर जाएं >>>



ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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12 June, 2017

संघर्ष -यानि संग-हर्ष जियो | ऊंचाईयां


जीवन है तो संघर्ष है
यूं तो प्रकृति प्रदत्त सब और सम्पदा है
जीवन को तो जीना है, क्यों ना फिर
संग-हर्ष जियो।
समय का पहिया घूम रहा है
युग परिवर्तन हो रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
अविष्कार भी आवश्यकता का कारण है
मानव बुद्धि में उपजे अणुओं,
मानव की दिव्य आलौकिक बुद्धि
ने दुनियाँ को नये-नये आयाम दिये हैं
आकाश क्या अन्तरिक्ष में भी मानव के
कदम पढ़े है ।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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