15 July, 2017

ऐसे जमाएं मलाईदार एवं स्वादिष्ट दही | आपकी सहेली


दही जमाना तो हर कोई जानता हैं। लेकिन क्या आप भी इस बात से परेशान रहते हैं कि ठंडी में दही बराबर जमता नहीं और गर्मी में खट्टा हो जाता हैं? या बाजार जैसा गाढ़ा, मलाईदार और स्वादिष्ट दही घर में नहीं जमता...तो अपनाएं दही जमाने का ये तरीका...और निजात पाएं दही से संबंधित अपनी हर समस्या से...!

सामग्री

• दूध- 1/2 लीटर
• दही- 1 छोटी चम्मच

ऐसे जमाएं मलाईदार एवं स्वादिष्ट दही

• पतीले में थोड़ा सा पानी लीजिए और उसे पतीले में चारों ओर अच्छे से घुमा दीजिए ताकि पतीला अंदर से अच्छे से गीला हो जाएं। पानी को फेंककर फ़िर पतीले में दूध डाल कर उबाले। ऐसा करने से दूध पतीले में नहीं चिपकेगा।

• दूध को गैस पर उबलने रखिए। दही पतला या गाढ़ा कैसा जमेगा यह दूध की गुणवत्ता पर निर्भर रहता हैं। अत: यदि आपको गाढ़ा और मलाईदार दही चाहिए और दूध पतला हैं, तो दूध को ज्यादा देर उबलने दीजिए। दूध जितना गाढ़ा होगा, दही भी उतना ही गाढ़ा जमेगा।

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


यदि आप भी अपनी ब्लॉग पोस्ट को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाना चाहते है। तो अपने ब्लॉग की नई पोस्ट की जानकारी या सूचना हमें दें। अपनी ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने के लिए अपने ब्लॉग पोस्ट का यूआरएल और अपने बारे में संक्षिप्त जानकारी एवं फोटो सहित हमें - iblogger.in@gmail.com पर ई-मेल करें।

भीख माँगती छोटी सी लड़की | ब्लॉग नई सोच


जूस (fruit juice) की दुकान पर,
एक छोटी सी लड़की...
एक हाथ से,  अपने से बड़े,
फटे-पुराने,मैले-कुचैले
कपड़े सम्भालती.....
एक हाथ आगे फैलाकर सहमी-सहमी सी,
सबसे भीख माँगती....

वह छोटी सी लड़की उस दुकान पर
हाथ फैलाए भीख माँगती....
आँखों में शर्मिंदगी,सकुचाहट लिए,
चेहरे पर उदासी ओढे....
ललचाई नजर से हमउम्र बच्चों को
सर से पैर तक निहारती....
वह छोटी सी लड़की, खिसियाती सी,
सबसे भीख माँगती.......

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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13 July, 2017

शिक्षा और सभ्यता | ब्लॉग ऊंचाईयां


शिक्षा, सभ्यता और आधुनिकता
शिक्षा है, तो सभ्यता आयी ,सभ्यता आयी तो आधुनिकता बड़ी।।
आज की युवा पीढ़ी शिक्षित हुयी
शिक्षा के संग सभ्यता आना स्वभाविक है
उत्तम संजोग है, सभ्यता, तरक्की और उन्न्ति की ऊँचाइयाँ छूना।
क्या सभ्यता, सिर्फ अत्यधिक धनोपार्जन और ब्रेंडड
वस्त्रों तक सीमित है।
आधुनिकता की दौड़ में सब दौड़ रहे है
लाभ के लोभ में, संस्कारों की हानि का कोई
खेद नहीं।।

सभ्यता के सही मायने ही नहीं ज्ञात
अत्यधिक धनोपार्जन करना ही, मात्र
तरक्की का सूचक नहीं।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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कहीं मेरे कफ़न की चमक | ब्लॉग एकलव्य


कुछ जलाये गए, कुछ बुझाये गए
कुछ काटे गए, कुछ दफ़नाये गए
मुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिली
मेरे अधूरे से नाम मिटाए गए 

एक वक़्त था! मेरा नाम शुमार हुआ करता था

चंद घड़ी के लिये ही सही, ख़ास-ओ-आम हुआ करता था
रातों -दिन महफ़ील जमती थी, मेरे महलों की चौखट पर
चारों पहर जलसे होते थे, मेरी नुमाइंदगी में
करते थे लोग सज़दे मेरी सादग़ी में

एक वक़्त आज है! अकेला क़ब्रिस्तान में पड़ा-पड़ा
ना जाने किसका इंतज़ार करता रहता हूँ

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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11 July, 2017

K.D. Sharma - Blogger of the Month for June 2017


माह जून के बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द मंथ छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले से के.डी. शर्मा जी है। शर्मा जी 2009 से ब्लॉगिंग कर रहे है और वर्तमान में स्टील इंडस्ट्री से जुड़े हुए है।
दिन रविवार, दिनांक 4 जनवरी 2009 को शर्मा जी ने ब्लॉग दुनिया में कदम रखा, लेकिन अपनी मौलिक पोस्ट के साथ नही। उन्होने कार्टूनिस्ट काजल कुमार जी के कार्टून को अपनी पहली पोस्ट बनाया।
शर्मा जी ने वास्तव में ब्लॉगिंग की शुरूवात रविवार, 25 जनवरी 2009 को 'आजादी के बाद के बड़े घोटाले' पोस्ट के साथ की। शर्मा जी के ब्लॉग का नाम है 'समाज की बात'। उन्होने अपने ब्लॉग के नामानुसार ही ब्लॉग में पोस्ट लिखीं है। कहने का मतलब है कि उन्होने अपने ब्लॉग के शीर्षक के साथ पूरा न्याय किया है और पाठक को निराश नहीं किया है।
शर्मा जी के ब्लॉग पर आपको मनोरंजन, कवितायेँ, मुद्दे, भ्रष्टाचार, लघुकथाएं, घरेलू नुस्खें, मार्गदर्शन, साहित्यकारों का परिचय, धर्म के अलावा विभिन्न कॉलमों में बंटे हुए अन्य बेहतरीन लेख पढ़ने को मिलेंगे। उन्होने समाज के सभी वर्ग को लेकर अपनी पोस्ट लिखी है। कहीं उन्होने पर्यावरण को लेकर तो कहीं पर उन्होने स्वास्थ्य को लेकर भी अपनी पोस्ट लिखी है।
इसके साथ ही आपको बताते चलें कि शर्मा जी एक कहानीकार और कवि भी है। उन्होने अब तक 60 कवितायेँ, 3 कहानियां और 15 लघुकथाएं लिखीं है।
उन्होने अपनी कविताओं में गांवो में हो रही तरक्की को बहुत ही सुन्दर शब्दों में बयां किया है। देखें नीचें दी गई पोस्ट में।

गाँव में बिजली (कविता)

दिन भर खेतों में काम करके
मिटाने अपनी थकान
लोग बैठा करते थे शाम को
गाँव की चौपाल में
या बरगद या नीम के पेड़ के नीचे
बने हुए कच्चे चबूतरों पर
और होती थी आपस में
सुख-दुःख की बातें
और हो जाती थी कुछ
हंसी-ठिठोली भी
महिलायें भी मिल लेती थीं आपस में
पनघट पर पानी भरने के बहाने
और कर लेती थीं साझा
अपना-अपना सुख-दुःख
मगर अब गाँव में
बिजली आ जाने से
बदल गए हैं हालात
और सूने से रहने लगे हैं
चौपाल और चबूतरे
अब नहीं होती हैं पनघट पर
आपस में सुख-दुःख की बातें
गाँव में बिजली आ जाने से
अब आ गए हैं टेलीविजन
लग गए हैं नल भी अब घरों में
ख़त्म हो गए हैं बहाने
अब घर से निकलने के

पूरी कविता पढ़ने के लिए क्लिक करें।

वहीं उन्होने लघुकथाओं में भी अपना डंका बजवा दिया है। उनकी कहानियों को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कि वो कहानी को अपने सामने ही शाक्षात देख रहे हो और उसका वर्णन कर रहे हो। आप भी पढ़े उनकी एक लघुकथा।

बड़े भाई (लघुकथा)

सन्डे की की सुबह-सुबह घंटी बजने पर पत्नी ने दरवाजा खोला तो सामने हाथ में एक बैग लिए पतिदेव के बड़े भाई खड़े थे। पत्नी ने अनमने भाव से उन्हें प्रणाम किया और सामने कमरे में ही उन्हें बैठाकर वापस बेडरूम पहुंची तो पति ने उंघते हुए पूछा “कौन है इतनी सुबह-सुबह?”। और कौन होगा"! आपके बड़े भाई साहब ही हैं। हर महीने आपसे मिलने चले आते हैं"।
“अब हमारी आज की पिकनिक का क्या होगा!” पति भी सोच में पड़ गया।
आज महीनों के बाद पिकनिक जाने की तैयारी बनी थी और बड़े भाई ने आकर पूरा प्लान ही चौपट कर दिया।
मगर बड़े भाई भी क्या करें भाभी 2 साल पहले ही गुजर चुकी हैं, दोनों बेटे अपनी नौकरी में ही व्यस्त रहते हैं। बहुएं भी उनका ध्यान नहीं रखती हैं इसलिए महीने में 1-2 दिन के लिए यहाँ पर आ जाते हैं। पत्नी थोडा भुनभुनाती जरूर है मगर पति संभाल लेता है।
पति भी उठकर बड़े भाई के पास गया। पांव छुए और हाल-चाल पूछने लगा।
1 घंटे के बाद फिर से दरवाजे की घंटी बजी। पति ने दरवाजा खोला तो सामने पत्नी के बड़े भाई सपरिवार खड़े थे। सब लोग अन्दर आये और हाल-चाल होने लगा।
पति ने थोडा मौका मिलते ही पत्नी से पूछा “क्यों जी अब हमारी पिकनिक का क्या होगा!”।
पत्नी ने आँखें तरेरते हुए कहा, “मैं खूब समझती हूँ तुम्हारे इशारे। ताने मत मारो, पंद्रह दिन के बाद तो मेरे भाई-भाभी यहाँ घूमने आये हैं और तुम्हें पिकनिक जाने की पड़ी है!”
पति ने चैन की सांस ली कि आज का दिन अच्छा गुजरेगा। पत्नी मेरे बड़े भाई को लेकर ताने तो नहीं मारेगी!......

शर्मा जी के ब्लॉग 'समाज की बात' को पढ़ने के लिए क्लिक करें।

इसके अलावा शर्मा जी ने एक ब्लॉग 'भंडाफोड़' 25 जनवरी, 2009 को शुरू किया था, यहां पर उन्होने कई बड़े भंडे फोड़े और उन्होने इस ब्लॉग पर 2 अप्रैल, 2014 को सीएपीडी के 147 कर्मचारियों अंतिम भंडा फोड़ कर किनारा कर लिया।
इसके साथ ही के.डी. शर्मा कई लघुकथाएं व कविताएं कई पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है। शर्मा जी को फेसबुक पर फालो करने के लिए यहां क्लिक करें।

07 July, 2017

बलात्कार के लिए दोषी कौन...पीड़िता, बलात्कारी या हम सब? | ब्लॉग आपकी सहेली

"उसने बहुत ही छोटे कपड़े पहन रखे थे!"
"अच्छी लड़कियाँ रात के नौ बजे के बाद बाहर नहीं जाती!"
"उसका तो चरित्र ही ऐसा था!!"

ऐसी बाते क्या दर्शाती हैं? यहीं न कि बलात्कार के लिए दोषी बलात्कारी नहीं बल्कि बलात्कार पीड़िता ही हैं! उसी ने बलात्कारी को न्यौता दिया, “आ...और मेरा बलात्कार कर!!!” यह वाक्य पढ़ने में ज़रुर अतिशयोक्तिपुर्ण लग रहा होगा लेकिन यहीं कड़वी सच्चाई हैं। आज भी हम बड़े से बड़े रूह कंपा देने वाले बलात्कार की घटना के बाद पीड़िता को ही दोषी मानते हैं। उसे ही भला-बुरा कहते हैं। उसे ही तिरस्कृत निगाहों से देखते हैं। अफ़सोस की इस जहर ने रगो के रंग को ही काला कर दिया हैं। यदि उपरोक्त कारणों की वजह से पीड़िता ही बलात्कार के लिए दोषी हैं तो एक ‘मेड’ जो प्राय: पूरे कपड़ों में रहती हैं या एकदम छोटी-छोटी तीन-चार साल की लड़कियां…जिनके अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे उन पर बलात्कार क्यों होता हैं? अत: बलात्कार के लिए पीड़िता को ही दोषी मानना इंसानियत का ही गला घोटना हैं।
बलात्कार के लिए बलात्कारी तो दोषी हैं ही लेकिन उससे ज्यादा दोषी हैं ‘हम सब’, हां... हम सब! कोई भी पुरुष बलात्कारी बनने के लिए पैदा नहीं होता। मुलत: एक पुरुष भी उतना ही मासुम होता हैं जितनी की एक स्त्री! फ़िर ऐसा क्या होता हैं कि कुछ पुरुष बलात्कार जैसा घिनौना कार्य करने तत्पर हो जाते हैं? वास्तव में हम सब मिल कर एक मासूम पुरूष को बलात्कारी बनाते हैं। हम पुरुषों की परवरिश ही कुछ इस तरह से करते हैं कि उनमें ''हम महिलाओं से श्रेष्ठ हैं और महिलाएं सिर्फ़ एक उपभोग की वस्तू हैं'' यह भावना पनपती हैैं।

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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06 July, 2017

स्वयं का नेतृत्व | ब्लॉग ऊंचाईयां


कौन कसके हक की बात करता है
अपने कर्मों की खेती स्वयं ही करनी पड़ती है
स्वयम ही स्वयम को प्रोत्साहित करो
काफिले में सर्प्रथम तुम्हे अकेले ही चलना पड़ेगा
जीत तो उसी की होती है ,जो स्वयम ही स्वयम का
नेतृत्व करता है।

मैंने उस वक्त चलना शुरू किया था
जब सब दरवाजे बंद थे,
पर मैं हारमानने वालों में से कहाँ था
कई आये चले गए ,सब दरवाजे बंद है
कहकर मुझे भी लौट जाने की सलाह दी गयी। पर,

मैं था जिद्दी ,सोचा यहां से वापिस नहीं लौटूंगा
टकटकी लगाये दिन-रात दरवाजा खुलने के इन्तजार
मैं पलके झपकाए बिना बैठा रहता,
बहुतों से सुना था दरवाजा सालों से नही खुला
पर मेरी जिद्द भी बहुत जिद्दी थी।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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मन और लेखनी | नई सोच


लिखने का मन है,...
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी कहानी।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है दुःखी लेखनी।
लिखने का मन है...
लिखती नहीं लेखनी।
मन मझधार में है...
लेखनी पार जाना चाहती,
मन में अपार गम हैं....
लेखनी सब भुलाना चाहती।

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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04 July, 2017

अहंकार | नई सोच


मानसूनी मौसम में बारिश के चलते,
सूखी सी नदी में उफान आ गया...
देख पानी से भरा विस्तृत रूप अपना,
इतराने लगी नदी, अहंकार छा गया...
बहाती अपने संग कंकड़-पत्थर,
फैलती काट साहिल को अपने....

हुई गर्व से उन्मत इतनी,
पास बने कुएं से उलझी.......
बोली कुआं! देखो तो मुझको,
देखो! मेरी गहराई चौड़ाई,
तुम तो ठहरे सिर्फ कूप ही,
मैं नदी कितनी भर आयी!...

शक्ति मुझमें इतनी कि सबको बहा दूँ ,
चाहूँ गर तो तुमको भी खुद में समा दूँ....
मैं उफनती नदी हूँ.! देखो जरा मुझको,
देखो! बढ रही कैसे मेरी गहराई चौड़ाई...

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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01 July, 2017

मेहनती मजदूर | ब्लॉग ऊंचाईयां


जीवन : हर एक के लिये जीवन की परिभाषा अलग-अलग है।
जब तक हम स्वयं तक सीमित रहते हैं, तब तक हमें जीवन वैसा ही लगता है, जैसा हम देखते और सोचते हैं। परन्तु जब हम स्वयं से बाहर निकल कर समाज, देश, दुनियाँ को देखते हैं, तब ज्ञात होता है कि जीवन की परिभाषा सब के लिये भिन्न -भिन्न है।
मनुष्य जब तक स्वयं तक सीमित रहता है, वो सोचता है कि सबसे ज्यादा अभावग्रस्त वो ही है, जितनी मुश्किलें और बंदिशें उसके पास हैं, उतनी किसी के हिस्से में नहीं। परन्तु जब हम अपने घर से बाहर निकलकर देखते हैं तो ऐसे-ऐसे कष्टों में लोग जी रहे होते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते, तब हम पाते हैं कि हम तो बहुत बेहतर जीवन जी रहे है, अभी तक हम बस यूँ ही रोते रहे।
मन ही मन को ढांढस बन्धता है, कहता है, देख ये कैसे-कैसे जीवन जी रहे हैं।
एक बार तपती दोपहरी में मेहनती मजदूरों को काम करते देख दिल पसीजा साथ में ही उनकी पत्नियां बच्चे सब के सब लगे हुए थे। कोई महिला इंठों का तसला सिर पर उठाए कोई रेते का बच्चे भी वहीं खेल रहे हैं मिट्टी में उन्हें कोई चिन्ता नहीं।

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